कैमरे के पीछे की कहानी: फोटोग्राफर सैमुअल बॉर्न की हिमालयी यात्राओं के दौरान नग्गर का ‘गदर’ और धर्मशाला का ‘सबक’
कैमरे के पीछे की कहानी: फोटोग्राफर सैमुअल बॉर्न की हिमालयी यात्राओं के दौरान नग्गर का ‘गदर’ और धर्मशाला का ‘सबक’
विनोद भावुक। धर्मशाला
19वीं सदी के ब्रिटिश फोटोग्राफर सेम्यूल बोर्न्स को अक्सर उनकी अद्भुत टेक्निकल स्किल और खूबसूरत नज़ारों की तलाश के लिए याद किया जाता है। सतलुज और स्पीति की घाटियों, कश्मीर की वादियों और ऊंचे पश्चिमी हिमालय के दृश्यों को कैमरे में कैद कर उन्होंने विश्व में पहचान बनाई, लेकिन इन तस्वीरों के पीछे एक और कहानी भी है। कहानी उन स्थानीय ‘कुलियों’ की, जिनके कंधों पर उनके अभियान टिके थे।
1863, 1864 और 1866 के हिमालयी अभियानों में बॉर्न के साथ लगभग तीस स्थानीय कुली थे। भारी कैमरे, कांच की प्लेटें, रसायन, तंबू और राशन, सब कुछ उन्हीं के सहारे दुर्गम पहाड़ों से गुज़रा। विकीमीडिया प्रायोजित ‘ओपन नॉलेज सीरीज 2025’ में प्रेसीडेंसी कॉलेज कोलकाता के इतिहास के स्टूडेंट चितरंजन बानिक का शोधपरक लेख इस अनदेखे पक्ष को सामने लाया गया है।
कुलियों की पिटाई के दो किस्से
धर्मशाला से कश्मीर जाते समय कुछ कुली सामान छोड़कर घर लौट गए। बॉर्न ने अपने लेखों में स्वीकार किया कि उन्होंने उन्हें दंडित किया। कुल्लू नग्गर में तो स्थिति और गंभीर हो गई। जब कुलियों ने आगे बढ़ने से इनकार किया, तो बॉर्न ने उन्हें डंडे से मारा। यह घटना उनके यात्रा वृत्तांत में दर्ज है। यह प्रसंग आज हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि साहसिक यात्राओं की चमक के पीछे कितनी सामाजिक जटिलताएँ छिपी थीं।
बॉर्न ने अपने कुलियों के लिए भोजन की ‘कमी’ का जिक्र किया है। गांववालों से अनाज और सामान खरीदने या मजबूरी में दिलवाने की घटनाएँ उनके लेखन में मिलती हैं। इससे स्थानीय सामाजिक संबंधों और लेन-देन की परंपराओं पर असर पड़ा। एक विदेशी अभियान ने अनजाने में ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था और संसाधनों के संतुलन को बदल दिया।
स्थानीय ज्ञान और सहयोग से सफलता
यद्यपि बॉर्न खुद को स्वतंत्र फोटोग्राफर बताते थे, लेकिन उनकी यात्राएँ औपनिवेशिक संस्थाओं की जानकारी पर आधारित थीं। उन्होंने सर्वे ऑफ इंडिया की सूचनाओं का उपयोग किया। ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे के कैप्टन थॉमस जॉर्ज मोंटगोमेरी के छोटे रूट मैप पर भरोसा करते हुए चंबा से कश्मीर तक का सफर तय किया। कल्पा के पास एक सर्वेयर की सलाह पर वे स्पीति की ओर मुड़े।
दूसरे अभियान में उनके साथ डॉ. जॉर्ज रैंकिन प्लेफेयर भी थे, जो भूगर्भीय खोज में लगे थे। किब्बर में जब वे जीवाश्म खोजने में असफल रहे, तो स्थानीय लोगों ने उन्हें फॉसिल्स उपलब्ध कराए। यह दिखाता है कि वैज्ञानिक और फोटोग्राफिक उपलब्धियाँ स्थानीय ज्ञान और सहयोग के बिना संभव नहीं थीं।
कुलियों की भूमिका नजरअंदाज
पहले हिमालयी अभियान के बाद दिसंबर 1863 में बॉर्न ने हॉवर्ड बोर्न्स एंड शेफर्ड स्टुडियो की स्थापना की, जो आगे चलकर भारत का सबसे प्रतिष्ठित फोटोग्राफिक स्टूडियो बना। उनकी कंपनी ने शिमला, कलकत्ता और बंबई में शाखाएँ खोलीं और औपनिवेशिक भारत की छवि गढ़ने में अहम भूमिका निभाई। सच यह है कि कैमरे के सामने जितना दिखता है, कैमरे के पीछे उससे कहीं ज्यादा छिपा होता है।
सैमुअल बॉर्न की तस्वीरें आज भी ‘भारत के शुरुआती दृश्य दस्तावेज़ों’ में गिनी जाती हैं, लेकिन इन तस्वीरों के पीछे काम करने वाले कुलियों, गाइडों और स्थानीय समुदायों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी। लेख के अनुसार, बॉर्न ने अपनी यात्राओं के वृत्तांत में कुलियों का जिक्र तो किया, पर उनकी हर भूमिका को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया।
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/illiterate-sunahro-devi-lit-the-flame-of-revolution-in-sirmaur-fighting-the-freedom-struggle-shoulder-to-shoulder-with-her-husband/
