असम के डिब्रूगढ़ के भबेश चंद्र सान्याल को कांगड़ा के अंद्रेटा गांव में मिले जीवन के रंग, मूर्तियों को मिला आकार
असम के डिब्रूगढ़ के भबेश चंद्र सान्याल को कांगड़ा के अंद्रेटा गांव में मिले जीवन के रंग, मूर्तियों को मिला आकार
विनोद भावुक। धर्मशाला
कांगड़ा जिला के पालमपुर उपमंडल के अंद्रेटा गांव को ‘कला ग्राम’ के नाम से जाना जाता है। इस गांव में असम के डिब्रूगढ़ के साधारण धोती-कुर्ता पहनने वाले बाबा सा दिखने वाले चित्रकार/ मूर्तिकार भबेश चंद्र सान्याल को जीवन के रंग मिले और उनकी बनाई मूर्तियों को आकार मिला। उन्हें भारतीय आधुनिक चित्रकला का द्रोणाचार्य कहा गया।
अंद्रेटा गांव सान्याल के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया। यहीं उन्होंने एक छोटा सा कॉटेज बनाया और रंग, मिट्टी व विचारों के साथ नए प्रयोग किए। अंद्रेटा उनके लिए केवल एक जगह नहीं थी, बल्कि एक दर्शन था। जीवन की ढलान पर उन्होंने अपनी पेंटिंग्स/ मूर्तियां बेचकर अंद्रेटा प्रोजेक्ट के लिए धन जुटाने में खास भूमिका अदा की।
लाहौर से दिल्ली, दिल्ली से अंद्रेटा
22 अप्रैल 1902 को असम के डिब्रूगढ़ में जन्मे सान्याल ने 1905 का बंगाल विभाजन,1947 का भारत विभाजन देखे। आर्ट एंड क्राफ्ट कॉलेज कोलकाता से पढ़ाई की। 1936 में मायो कॉलेज लाहौर से इस्तीफा वे लाहौर कॉलेज ऑफ आर्ट से जुड़े और 1947 तक पढ़ाया। देश के बंटवारे के बाद जब सान्याल दिल्ली आए और गोल मार्केट दिल्ली का उनका ‘शरणार्थी स्टूडियो’ भारतीय कला का केंद्र बना।
जीवन के उत्तरार्ध में उनका मन शोर से दूर, प्रकृति और सृजन की तलाश में भटकने लगा। उनकी यात्रा अंद्रेटा आकार पूरी हुई। अंद्रेटा उनकी कला साधना का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। इतिहास की उथल-पुथल के बीच उनकी कला मनुष्य, पीड़ा और आशा और उनके बीच के रिश्ते को लेकर सवाल पूछती रही। उनकी कृतियां ‘डिसपेर’, वे टू पीस और ‘द फ्लाइंग स्केरक्रो’ 20वीं सदी के भारत की आत्मा हैं।
रंगमंच, चित्रकला व मूर्तिकला का साझा मंच
अंद्रेटा में रहते हुए सान्याल का पंजाबी रंगमंच की महान हस्ती नोराह रिचर्ड्स से गहरा जुड़ाव हुआ, जो पंजाबी रंगमंच की महान हस्ती थीं। इस संगम ने अंद्रेटा को रंगमंच, चित्रकला और मूर्तिकला का साझा मंच बना दिया। एक छोटा सा गांव रंगमंच, चित्रकला और मूर्तिकला की उत्तर भारत की सबसे जीवंत कला प्रयोगशाला बन गया।
सान्याल ने यह साबित किया कि पहाड़ भारतीय आधुनिक कला के चिंतन केंद्र भी बन सकते हैं। उन्होंने जीवन के आख़िरी वर्षों तक अपने चित्रों की प्रदर्शनियां आयोजित कीं।उनकी कला का केंद्र कभी राजमहल नहीं रहा। उनके चित्रों में राजघरानों की चमक- धमक नहीं, मज़दूर, किसान, विस्थापितों और साधारण मनुष्य की असाधारण पीड़ा दिखती है।
100 वर्ष की उम्र में लिथोग्राफ़ी पर हाथ
मां की स्मृति में बनाई गई उनकी प्रसिद्ध मूर्ति ‘द विलेड फिगर’ (The Veiled Figure) भारतीय मूर्तिकला में एक भावनात्मक क्रांति मानी जाती है। सान्याल ने 100 वर्ष की उम्र में लिथोग्राफ़ी जैसे नए माध्यमों में हाथ आज़माया। सान्याल को 1980 में ललित कला अकादमी फ़ेलोशिप, 1984 पद्म भूषण और असम सरकार का शंकर देव पुरस्कार मिला।
इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट ने उनके सम्मान में उनके 100वें जन्मदिन पर 170 चित्रकारों की प्रदर्शनी आयोजित की। सम्मानस्वरूप उनके ऊपर एक डाक टिकट भी जारी किया गया। 101 साल की उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन अपने पीछे चित्रकला और मूर्तिकला की बड़ी विरासत छोड़ गए।
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