बर्मा के युद्ध क्षेत्र में जापानी सेना के बंकर उड़ाने वाले बिलासपुर के भंडारी राम, सम्मान में ब्रिटेश सरकार ने दिया‘विक्टोरिया क्रॉस’

बर्मा के युद्ध क्षेत्र में जापानी सेना के बंकर उड़ाने वाले बिलासपुर के भंडारी राम, सम्मान में ब्रिटेश सरकार ने दिया‘विक्टोरिया क्रॉस’
बर्मा के युद्ध क्षेत्र में जापानी सेना के बंकर उड़ाने वाले बिलासपुर के भंडारी राम, सम्मान में ब्रिटेश सरकार ने दिया‘विक्टोरिया क्रॉस’
हिमाचल बिजनेस स्पेशल। बिलासपुर
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बर्मा के अराकान क्षेत्र में जापानी सेना के खिलाफ ब्रिटिश सेना का भीषण संघर्ष चल रहा था। 22 नवम्बर 1944 को, ईस्ट मायू (अराकान) में भारतीय ब्रिटिश सेना की उस टुकड़ी को एक ऊँची पहाड़ी पर बने जापानी बंकर पर हमला करना था। तत्कालीन कहलूर रियासत (वर्तमान बिलासपुर) के भंडारी राम इस टुकड़ी में बतौर सिपाही शामिल थे।
जैसे ही ब्रिटिश सैनिक शिखर के करीब पहुँचे, दुश्मन की मशीनगन से गोलियों की बारिश शुरू हो गई। कई सैनिक घायल हो गए। भंडारी राम के कंधे और पैर में गोलियाँ लगीं, पर वे रुके नहीं। गहरे जख्म और चेहरे पर ग्रेनेड के छर्रे लगने के बावजूद, वे रेंगते हुए दुश्मन के बंकर के करीब पहुँचे और मात्र पाँच गज की दूरी से ग्रेनेड फेंककर मशीनगन पोस्ट को नष्ट कर दिया।
लंदन की अखबार में बहदुरी का किस्सा
भंडारी राम ने कुछ की पलों में घटनाक्रम को बदल दिया। सैनिकों में जोश आ गया और नए खून का संचार हुआ। उनकी इस वीरता से प्रेरित होकर पूरी टुकड़ी आगे बढ़ी और दुश्मन का मोर्चा जीत लिया। 8 फरवरी 1945 को लंदन गेजेट में उनकी बहादुरी का आधिकारिक उल्लेख प्रकाशित हुआ और भंडारी राम धैर्य, त्याग और अदम्य संकल्प की मिसाल बन गए।
24 जुलाई 1919 को कलहूर रियासत के गेहड़वीं क्षेत्र में जन्मे भंडारी राम एक साधारण ब्राह्मण परिवार से थे। 1941 में वे ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए और 16वीं बटालियन, 10वीं बलूच रेजीमेंट में सिपाही बने। देश की सीमाओं से परे जाकर राष्ट्र और मानवता की सेवा के लिए अदम्य साहस के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें विक्टोरिया क्रॉस देने की घोषणा की।
‘हिस्ट्री ऑफ ब्लूच रेजीमेंट’ में दिलेरी का जिक्र
साल 2000 में प्रकाशित ‘हिस्ट्री ऑफ ब्लूच रेजीमेंट 1939-1956’ में रफीयुद्दीन अहमद ने भण्डारी राम के दिलेरी भरे कारनामे को वीरता की अनूठी मिसाल कहा है। स्वतंत्रता के बाद भी भंडारी राम भारतीय सेना में सेवा करते रहे। 1958 में सूबेदार, 1967 में सूबेदार मेजर और 1969 में मानद कैप्टन के पद से सेवानिवृत्त हुए।
ब्रिटिश सरकार के विक्टोरिया क्रॉस के अलावा भारतीय सेना में उन्हें परम विशिष्ट सेवा पदक सहित कई सैन्य सम्मान प्राप्त हुए। वे अनुशासित सैन्य अधिकारी के तौर पर अपनी खास पहचान रखते थे। 19 मई 2002 को उनका निधन हुआ। उन्होंने साबित किया कि एक साधारण पहाड़ी युवक भी विश्व इतिहास में असाधारण छाप छोड़ सकता है।
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Jyoti maurya

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