चर्चा में किताब : महान साहित्य कभी बूढ़ा नहीं होता, वह नई आवाज़ों का इंतज़ार करता है, कालिदास की अमर धरोहर ‘मेघदूतम्’ का नया रूप पृथीपाल सिंह का ‘आषाढ़ का प्रथम दिवस’
चर्चा में किताब : महान साहित्य कभी बूढ़ा नहीं होता, वह नई आवाज़ों का इंतज़ार करता है, कालिदास की अमर धरोहर ‘मेघदूतम्’ का नया रूप पृथीपाल सिंह का ‘आषाढ़ का प्रथम दिवस’
विनोद भावुक। धर्मशाला
महान साहित्य कभी बूढ़ा नहीं होता, वह केवल नई आवाज़ों का इंतज़ार करता है। हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ एचएएस अधिकारी और रचनाकार पृथीपाल सिंह का काव्य-संग्रह ‘आषाढ़ का प्रथम दिवस’ इस बात की गवाही देता है। उनकी यह कृति संस्कृत के महाकवि कालिदास की अमर रचना ‘मेघदूतम्’ का हिंदी काव्यात्मक रूपांतरण है।
स्कूल के दिनों में अभिज्ञान शाकुंतलम का हिंदी रूपांतरण पढ़ते हुए पृथीपाल सिंह का ध्यान कालिदास की काव्य-शक्ति की ओर गया था। बाद में मेघदूतम् का शाब्दिक हिंदी अनुवाद उनके हाथ लगा, जिसने उनके भीतर यह भाव जगाया कि इस काव्य को आधुनिक हिंदी में पुनः प्रस्तुत किया जाए।
कालिदास के साथ एक काव्यात्मक संवाद
‘आषाढ़ का प्रथम दिवस’ कवि का कालिदास के साथ एक काव्यात्मक संवाद है। यह महज़ शब्दों का अनुवाद नहीं है। यह अनुवाद, रूपांतरण और प्रेरित रचना तीनों का संगम है। अनुवाद के तौर पर मूल भाव और विचारों को निष्ठा से हिंदी में लाया गया है।
रूपांतरण इतना भर कि चार पंक्तियों के संस्कृत छंद को छह पंक्तियों तक विस्तारित किया गया है, ताकि गहराई बरकरार रहे। प्रेरक इसलिए कि शीर्षक ‘आषाढ़ का प्रथम दिवस’ मानसून और इस अमर यात्रा की शुरुआत का प्रतीक है।
संस्कृत और हिंदी का संतुलन
संस्कृत का मंदाकारंत छंद बादलों की धीमी चाल जैसा है। इसे आधुनिक हिंदी में ढालना चुनौतीपूर्ण था। पृथीपाल सिंह ने हिंदी की सहजता और संस्कृत की भव्यता का संतुलन बनाने की कोशिश की, ताकि मूल की सुगंध बनी रहे और आज का पाठक सहज भाव से पढ़ सके।
कालिदास की शक्ति उनके बिंब और रस में है। पृथीपाल सिंह कहते हैं कि उनका प्रयास व्याख्या करना नहीं, बल्कि उन बिंबों को आज की भाषा में सांस लेने देना है। यदि पाठक बादल को चलते हुए देख सके और यक्ष की तड़प को महसूस कर सके, तो मेरा प्रयास सफल है।
चुनौती भरा काम, संस्कृत साहित्य का निमंत्रण
मेघदूतम् में परिदृश्य की भव्यता और मानवीय भावनाओं की अंतरंगता को एक साथ पिरोना सबसे कठिन था। खासकर तब जब कालिदास ने प्रकृति को कामुक सौंदर्य के रूप में प्रस्तुत किया। पृथीपाल सिंह ने इसे गरिमा और शालीनता के साथ हिंदी में ढाला है।
पृथीपाल सिंह मानते हैं कि यह कृति युवाओं को संस्कृत साहित्य की ओर आकर्षित कर सकती है। यह रचना एक निमंत्रण है संस्कृत साहित्य के विराट घर में प्रवेश करने का।
अगर कालिदास पढ़ते तो क्या महसूस करते
आषाढ़ का प्रथम दिवस’ केवल एक काव्य नहीं, बल्कि अतीत और वर्तमान के बीच एक सेतु है। यह कृति दिखाती है कि महान रचनाएं समय से परे होती हैं। उन्हें हर पीढ़ी के लिए नए ढंग से प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।
पृथीपाल सिंह का मानना है कि यदि कालिदास उनकी इस पुनर्कल्पना पढ़ते, तो वे शांत मुस्कान के साथ यही महसूस करते कि उनकी दृष्टि को ईमानदारी और श्रद्धा से आगे बढ़ाया गया है।
ओबीसी वित्त निगम के प्रबंध निदेशक
हिमाचल प्रदेश प्रसाशनिक सेवा के अधिकारी पृथीपाल सिंह वर्तमान में कांगड़ा स्थित अन्य पिछड़ा वर्ग वित्त निगम के प्रबंध निदेशक के पद पर तैनात हैं।
मूल रूप से कांगड़ा जिला के ज्वाली विधानसभा क्षेत्र से संबंध रखने वाले पृथीपाल सिंह एडीएम भरमौर, एसीसी टू चंबा, नगर निगम धर्मशाला के कमिशनर के पद पर सेवाएँ दे चुके हैं।
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