छोटी काशी’ से करियर की शुरुआत करने वाले ब्रिटिश अफसर गार्बेट, जिन्होंने किया सूफ़ी कवि रूमी की कविताओं का अनुवाद
छोटी काशी’ से करियर की शुरुआत करने वाले ब्रिटिश अफसर गार्बेट, जिन्होंने किया सूफ़ी कवि रूमी की कविताओं का अनुवाद
विनोद भावुक। मंडी
छोटी काशी के नाम से मशहूर ऐतिहासिक नगरी मंडी जहां अपनी लोकपरंपराओं के लिए मशहूर है, वहीं औपनिवेशिक दौर के प्रशासनिक प्रयोगों के लिए भी जानी जाती है। इसी मंडी से ब्रिटिश भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी कॉलिन कैम्पबेल गार्बेट ने अपने करियर की शुरुआत की, जो एक न्यायविद, कूटनीतिज्ञ और सूफ़ी साहित्य के संवेदनशील अनुवादक के मशहूर हुए।
मंडी का प्रशासनिक अनुभव गार्बेट के लिए जहां अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों तक पहुँचने की नींव बना, वहीं उनको उनके आध्यात्मिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी स्थापित किया। उन्होंने 1956 में ‘सन ऑफ तबरिज’ के नाम से सूफ़ी कवि जलालुद्दीन रूमी की कविताओं का अनुवाद किया। बाबा सावन सिंह की शिक्षाओं और सूरत शब्द योग में भी गहरी रुचि के चलते 1967 में ‘रींगिंग रेडियंश’ पुस्तक लिखी।
डलहौजी में जन्म, मंडी से करियर की शुरुआत
22 मई 1881 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के डलहौज़ी में जन्मे गार्बेट का बचपन हिमालयी परिवेश में बीता। शिक्षा के लिए उन्हें इंग्लैंड भेजा गया, जहां आइल ऑफ़ मैन के किंग विलियम्स कॉलेज में उन्होंने अध्ययन किया। यह वही दौर था जब साम्राज्यवादी प्रशासन के लिए तेज़ दिमाग़ और कड़े अनुशासन की तैयारी की जाती थी। उन्होंने1905 में आईसीएस की परीक्षा पास की।
आईसीएस में चयन के बाद साल 1910 में गार्बेट की पहली महत्वपूर्ण पोस्टिंग अपनी भौगोलिक दुर्गमता, लोकसंस्कृति और प्रशासनिक विशिष्टता के पहचान रखने वाली मंडी रियासत में हुई। मंडी से गार्बेट ने पहाड़ी समाज, स्थानीय प्रशासन और न्यायिक परंपराओं को करीब से समझा। स्थानीय जनजीवन, पहाड़ी रास्ते, सीमित संसाधन और संवेदनशील प्रशासन, इन सबने उनके दृष्टिकोण को व्यापक बनाया।
शिमला से बंबई तक: न्याय, युद्ध और कूटनीति
1913 में गार्बेट शिमला में जिला न्यायाधीश बने। 1915–16 में प्रथम विश्व युद्ध के संवेदनशील दौर में उन्होंने कराची और बंबई में डाक सेंसर की ज़िम्मेदारी निभाई। 1916 में सरकार ने उन्हें मेसोपोटामियन अभियान में चीफ़ पॉलिटिकल ऑफ़िसर नियुक्त किया। 1919 में वे इंडिया ऑफिस में सहायक सचिव, 1920 में इराक में हाई कमिश्नर और कमांडर-इन-चीफ़ के पॉलिटिकल सेक्रेटरी बने।
9 दिसंबर 1920 को इराक के तौक़ (दाक़ूक़) में एक ब्रिस्टल फ़ाइटर विमान हादसे का शिकार हुआ। इस हादसे ने विमान के पायलट की मृत्यु हो गई, जबकि गार्बेट गंभीर रूप से घायल हुए पर बच निकले। यह हवाई घटना उनके जीवन का निर्णायक क्षण बनी, जिसने उन्हें भीतर से और मज़बूत किया। उन्हें सीआईए, सीएमजी, सीएसआई, ऑर्डर ऑफ़ सेंट जॉन और नाइट कमांडर जैसे अवार्ड मिले।
निजी जीवन और असाधारण उत्तरकथा
गार्बेट ने दो विवाह किए और सुसान नाम की एक पुत्री के पिता बने। जीवन के उत्तरार्ध में दक्षिण अफ्रीका में बस गए। उनका निजी जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहा। 10 अगस्त 1972 को उनकी मृत्यु हुई। वर्षों बाद आश्चर्यजनक रूप से उनकी अस्थियां एक रीसाइक्लिंग केंद्र से मिलीं और अंततः परिवार के साथ लंदन में उनका अंतिम संस्कार हुआ।
मंडी रियासत में बिताये गए शुरुआती प्रशासनिक काल ने गार्बेट के पूरे करियर की दिशा तय की। साहित्य और अध्यात्म के प्रति उनके झुकाव की वजह भी उनका मंडी प्रवास ही रहा। ‘सन ऑफ तबरिज’
और ‘रींगिंग रेडियंश’ जैसी पुस्तकों के लेखन की पृष्ठभूमि मंडी बनी। यह सब साबित करते हैं कि मंडी केवल स्थानीय इतिहास नहीं, बल्कि वैश्विक विचारों और व्यक्तित्वों की प्रयोगशाला भी रही हैं।
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