1857 के विद्रोह में घायल ब्रिटिश सैनिकों का डगशाई में हुआ था उपचार, अंग्रेज़ ऑफिसर की पुस्तक में छपे चित्र का खुलासा

1857 के विद्रोह में घायल ब्रिटिश सैनिकों का डगशाई में हुआ था उपचार, अंग्रेज़ ऑफिसर की पुस्तक में छपे चित्र का खुलासा
1857 के विद्रोह में घायल ब्रिटिश सैनिकों का डगशाई में हुआ था उपचार, अंग्रेज़ ऑफिसर की पुस्तक में छपे चित्र का खुलासा
अजय शर्मा। सोलन
सोलन का डगशाई क्षेत्र ब्रिटिश काल की सैन्य रणनीति, चिकित्सा व्यवस्था और 1857 के विद्रोह की गूंज का साक्षी रहा है। 1857–58 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौर में यह छोटा सा पहाड़ी कस्बा घायल ब्रिटिश सैनिकों की शरणस्थली बन गया था। ब्रिटिश सेना ने डगशाई को एक रिकवरी स्टेशन या स्वास्थ्य शिविर के रूप में विकसित किया था।
सन 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम की चिंगारी जब देशभर में फैल रही थी, तब ब्रिटिश सैन्य ठिकानों में भी हलचल मच गई। जैसे ही विद्रोह की खबर पहाड़ी छावनियों तक पहुंची, डगशाई से सैनिकों को तुरंत दिल्ली भेज दिया गया, जहां अंग्रेजों और विद्रोही सैनिकों के बीच निर्णायक संघर्ष चल रहा था। कई सैनिक घायल थे या बीमार पड़ चुके थे, ऐसे सैनिकों के लिए डगशाई आश्रय बन गया।
1857 के दिल्ली संघर्ष में घायल कई सैनिक बाद में डगशाई लौटे और यहीं स्वास्थ्य लाभ किया। यहाँ का मौसम मैदानी इलाकों की तपती गर्मी से कहीं अधिक अनुकूल था, इसलिए घायल और बीमार सैनिकों को यहाँ भेजा जाता था। 1857 में घायल सैनिकों की उपस्थिति ने इस छोटे से कस्बे को इतिहास में अमर कर दिया।
ब्रिटिश अधिकारी जॉर्ज फ्रेंकलिन अटकिनसन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ड कॅम्पेन इन इंडिया 1857-8 में डगशाई का एक चित्र प्रकाशित किया, जिसमें घायल सैनिकों की देखभाल का दृश्य दिखाया गया है। यह चित्र आज भी उस दौर की वास्तविकता को जीवंत कर देता है और बताता है कि डगशाई भारत के औपनिवेशिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।
इतिहासकारों के अनुसार डगशाई का नाम फारसी शब्द ‘दाग़-ए-शाही’ से निकला है, जिसका अर्थ होता है राजकीय दंड का स्थान। कहा जाता है कि मुगल काल में यहाँ अपराधियों को दंड दिया जाता था और उनके शरीर पर शाही निशान लगाया जाता था। बाद में अंग्रेजों ने इस स्थान को सैन्य छावनी में बदल दिया था।
आज भी डगशाई हिमाचल की सबसे पुरानी छावनियों में से एक मानी जाती है। डगशाई एक शांत और सुंदर कस्बा है, लेकिन इसकी हर गली और हर पुरानी इमारत इतिहास की कहानी कहती है। ब्रिटिश काल का चर्च, कब्रिस्तान और सैन्य इमारतें आज भी उस दौर की याद दिलाती हैं जब यह छोटा सा पहाड़ी कस्बा युद्ध के घायलों के लिए जीवन का सहारा बन गया था।
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Jyoti maurya

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