चौधरी सिधू राम देश की आजादी के लिए हुए कुर्बान, स्मारक स्थल पर प्रतिमा लगाकर किया सम्मान
चौधरी सिधू राम देश की आजादी के लिए हुए कुर्बान, स्मारक स्थल पर प्रतिमा लगाकर किया सम्मान
हिमाचल बिजनेस। सुजानपुर
हमीरपुर जिला के सुजानपुर के महान स्वतन्त्रता सेनानी देश की आजादी के लिए कुर्बान हुये थे। अब सुजानपुर में चौधरी सिधू राम चौक पर उनकी प्रतिमा स्थापित कर चौधरी फ़ाउंडेशन ने उनकी श्हादत का सम्मान किया है। उनके स्मारक स्थल पर स्वतन्त्रता संग्राम में उनकी भूमिका का वृतांत भी अंकित किया गया है, जिससे साबित होता है कि वे बड़े कद के क्रांतिकारी थे।
सुजानपुर का चौधरी सिधू राम चौक उस समय सुर्खियों में आया था, जब इस चौक पर स्वतन्त्रता सेनानी की प्रतिमा के स्थान पर एक परी की मूर्ति स्थापित होने पर चौधरी फ़ाउंडेशन ने कड़ा विरोध जताते हुये उपमंडल प्रशासन को ज्ञापन दिया था। परी की मूर्ति को कपड़े से ढाँप दिया गया था और यहाँ स्वतन्त्रता सेनानी की प्रतिमा स्थापित करने पर सहमति बनी थी।
आज़ादी के लिए सर्वस्व न्यौछावर
चौधरी सिंधु राम का जन्म 1873 ई. में सुजानपुर में हुआ था। वे देश की आज़ादी की भावना से ओत-प्रोत थे और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे। उनकी देशभक्ति केवल विचारों तक सीमित नहीं थी, उन्होंने उसे कर्म में बदल दिया और सार्वजनिक मंचों पर ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने का ऐलान किया।
चौधरी सिधू राम स्मारक स्वतंत्रता संग्राम की उस अनकही कहानी को जीवंत करता है, जिसे समय भले धुंधला कर दे, लेकिन इतिहास कभी नहीं भूलता। इस स्मारक पर अंकित शब्द हमें एक ऐसे वीर स्वतंत्रता सेनानी चौधरी सिंधु राम के संघर्ष की याद दिलाते हैं, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था।
धर्मशाला और गुरदासपुर जेल में कैद
देश में स्वतंत्रता आंदोलन नई ऊंचाइयों पर था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था और अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज़ उठाना किसी भी भारतीय के लिए खतरे से खाली नहीं था। चौधरी सिधु राम ने सरकार विरोधी गतिविधियों ने अंग्रेजी शासन की रातों की नींद हराम कर दी थी। ब्रिटिश पुलिस ने 5 मार्च 1930 को गिरफ्तार कर उन्हें धर्मशाला जेल भेज दिया।
16 सितंबर 1930 को बेड़ियों में जकड़कर उन्हें गुरदासपुर जेल में भेज दिया गया, लेकिन जेल की सलाखें उनके हौसले को तोड़ नहीं सकीं। जेल मे भी उन्होंने संघर्ष जारी रखा। देश को आजाद देखने का सपना बुनने वाले चौधरी सिधु राम देश के आजाद होने से तीन साल पहले 1944 में संघर्ष करते-करते भगवान को प्यारे हो गए।
अतीत की निशानी, भविष्य की प्रेरणा
चौधरी सिधु राम यह बलिदान उस पीढ़ी का प्रतीक है, जिसने स्वतंत्र भारत का सपना देखा और उसे साकार करने के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी। आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, तो ऐसे सेनानियों की याद हमें यह एहसास कराती है कि आज़ादी सहज नहीं थी। इसकी नींव में कई स्वतन्त्रता सेनानियों के बलिदान दफन हैं।
चौधरी सिधु राम की कहानी हमें सिखाती है कि देशभक्ति केवल नारों में नहीं, कर्म में होनी चाहिए। अगर इरादे अटल हों तो कठिन परिस्थितियां भी दृढ़ निश्चय को नहीं तोड़ सकतीं। चौधरी सिधु राम का स्मारक पूरे क्षेत्र की देशभक्ति का प्रतीक है। ऐसे स्मारक हमें अपने अतीत से जोड़ते हैं और भविष्य के लिए प्रेरित करते हैं।
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/gulers-court-poet-uttams-celebrated-work-dilip-ranjani-has-been-republished-after-260-years-a-rare-example-of-writing-the-history-of-the-princely-state-in-verse/
