‘सेवियर ऑफ लद्दाख’ कहे जाने वाले लाहौल के कर्नल ठाकुर पृथी चंद, 18 वलांटियर्स के साथ किया था कश्मीर से लेह तक का जोखिम भरा सफर

‘सेवियर ऑफ लद्दाख’ कहे जाने वाले लाहौल के कर्नल ठाकुर पृथी चंद, 18 वलांटियर्स के साथ किया था कश्मीर से लेह तक का जोखिम भरा सफर
‘सेवियर ऑफ लद्दाख’ कहे जाने वाले लाहौल के कर्नल ठाकुर पृथी चंद, 18 वलांटियर्स के साथ किया था कश्मीर से लेह तक का जोखिम भरा सफर
हिमाचल बिजनेस स्पेशल। केलंग
1948 की कड़ाके की सर्दियों में ज़ोजिला दर्रे पर बर्फ़ 20 फीट तक जमी थी। उस हालत में एक सैन्य अधिकारी ने इतिहास की दिशा मोड़ने का संकल्प लिया। उस सेना अधिकारी का नाम था कर्नल ठाकुर पृथी चंद, जिन्हें आज सेवियर ऑफ लद्दाख के नाम से जाना जाता है। लद्दाख और लाहौल के बीच पुराने सांस्कृतिक संबंध थे। जब लद्दाख पर संकट आया, तो ठाकुर पृथी चंद का हृदय चुप न रह सका।
भारत-पाक युद्ध (1947–48) के दौरान लद्दाख पर खतरा मंडरा रहा था। बाल्टिस्तान पर दुश्मन का कब्ज़ा हो चुका था, कारगिल गिर चुका था, और दुश्मन लेह की ओर बढ़ रहा था। फरवरी 1948 में मेजर पृथी चंद ने 18 वलांटियर्स के साथ कश्मीर घाटी से लेह तक का जोखिम भरा सफर तय किया। बिना विशेष उपकरणों के, ज़ोजिला दर्रे (11,000 फीट) को पार करना अपने आप में एक करिश्मा था।
सत्तू खाकर मैदान में डटी रही टुकड़ी
लेह पहुंचकर पृथी चंद ने दो प्लाटून जम्मू-कश्मीर स्टेट फोर्स का नेतृत्व संभाला, लगभग 200 स्थानीय मिलिशिया तैयार की, गुरिल्ला रणनीति अपनाकर दुश्मन की प्रगति रोकी तथा इंडस और नुब्रा घाटियों में लगातार छापामार कार्रवाई की। उनकी टुकड़ी सत्तू खाकर और सीमित गोला-बारूद में भी डटी रही, जब तक कि वायु मार्ग से मदद नहीं पहुंची।
कहते हैं कि पृथी चंद हर जगह दिखते थे। एक दिन इंडस घाटी, अगले दिन नुब्रा—सैकड़ों मील का मोर्चा, पर हौसला अडिग। उनके इस अद्वितीय साहस के लिए 15 अगस्त 1948 को उन्हें भारत के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके चचेरे भाई महावीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट कर्नल कुशल चंद और वीर चक्र से सम्मानित सूबेदार भीम चंद लद्दाख रक्षा में अमर हुए।
पिता के नक्शेकदम पर बेटा
1 जनवरी 1911 को कुल्लू ज़िले के मनाली के पास के रांगड़ी गांव में जन्मे पृथी चंद ने कुल्लू से हाई स्कूल और श्री प्रताप कॉलेज श्रीनगर से स्नातक की पढ़ाई के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते वज़ीरात में हाथ बंटाने का काम किया। अनुशासन, साहस और नेतृत्व तीनों उनके व्यक्तित्व का हिस्सा थे। इसी वजह से किस्मत ने उन्हें फौजी वर्दी के लिए चुना था।
पृथी चंद, लाहौल के प्रतिष्ठित ‘हाउस ऑफ केलोंग’ से संबंध रखते थे। उनके पिता ठाकुर अमर चंद लाहौल के वज़ीर रहे। वे पहले विश्व युद्ध में मेसोपोटामिया मोर्चे पर लड़े थे। सेवा के सम्मान में उन्हें ‘राय बहादुर’ की उपाधि मिली थी। पिता की राह पर चलते हुये पृथी चंद 1933-34 में 11/17 डोगरा रेजिमेंट में भर्ती हुये 1939 में कमीशन पाकर 2 डोगरा बटालियन में सेकंड लेफ्टिनेंट बने।
हिमालयन बौद्ध सोसाइटी के अध्यक्ष
1950 में लेफ्टिनेंट कर्नल पदोन्नत होकर पृथी चंद ने 3/11 गोरखा रेजिमेंट की कमान संभाली। 1962 में कर्नल पद से सेवानिवृत्त हुए। सेना से निवृत्ति के बाद उन्होंने समाज सेवा जारी रही। एक योद्धा, एक आस्थावान बौद्ध और एक सादगीपूर्ण व्यक्तित्व के मालिक पृथी चंद मनाली की हिमालयन बौद्ध सोसाइटी के अध्यक्ष रहे और सोसायटी के लिए कई अहम काम किए।
कर्नल ठाकुर पृथी चंद पहाड़ के सपूत, लद्दाख के संरक्षक, और भारतीय सेना की परंपरा के गौरव हैं। लद्दाख की वादियां आज भी उन्हें ‘रक्षक’ के रूप में याद करती हैं। अगर 1948 में वह 18 वीरों के साथ हिमालय की बर्फ़ चीरकर आगे न बढ़ते, तो इतिहास की तस्वीर शायद अलग होती। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि संसाधन कम हों तो क्या, इरादा हिमालय से ऊंचा हो तो जीत तय है।
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Jyoti maurya

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