हैम्बर्ग के डाइटर ने बीस साल पहले केलंग से फ्यूल टैंकर में लिफ्ट लेकर किया लेह तक रोमांचक सफर, नजदीक से हुए थे मौत के दर्शन
हैम्बर्ग के डाइटर ने बीस साल पहले केलंग से फ्यूल टैंकर में लिफ्ट लेकर किया लेह तक रोमांचक सफर, नजदीक से हुए थे मौत के दर्शन
विनोद भावुक। हिमाचल बिजनेस
जर्मनी के वर्ल्ड ट्रैवलर, फ़ूडी, फ़ोटोग्राफ़र और मोटरसाइकिल एडवेंचर राइडर यात्री डाइटर क्रूज़े को 20 साल पहले केलंग से लेह तक का सफर पेट्रोल–डीज़ल ढोने वाले फ्यूल टैंकरों में लिफ्ट लेकर किया था। हैम्बर्ग से आने वाले डाइटर क्रूज़े अब चियांग माई, थाईलैंड में रहते हैं। उन्होंने चियांग माई यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की और खुद को पूरी तरह यात्राओं के हवाले कर दिया।
उन्होंने फेसबुक ग्रुप ’60s,’70s &’80s Trails to India’ में अपनी रोमांचक ट्रेवल स्टोरी अपलोड की है। उनकी यह कहानी सिर्फ़ एक यात्रा नहीं है, उस दौर का दस्तावेज़ है, जब मनाली– लेह मार्ग बेहद दुर्गम था और सुविधाएँ नाममात्र थीं। साहसी लोग तब भी इस रोड से सफर करते थे।
धीमी रफ्तार के चलते लंबा सफर
डाइटर बताते हैं कि करीब 20 साल पहले उन्होंने केलंग से लेह तक का सफ़र पेट्रोल–डीज़ल ढोने वाले फ्यूल टैंकरों में लिफ्ट लेकर किया था। दुनिया के सबसे खतरनाक रोड़ पर ये टैंकर 20 किमी प्रति घंटा से ज़्यादा रफ़्तार नहीं पकड़ते थे। केलंग से लेह तक का सफ़र 30 घंटे में पूरा होता था।
टेंकरों में यात्रियों को बैठाने की अनुमति नहीं थी, इसलिए हर चेकपोस्ट पर डाइटर को ट्रक के फ़र्श के नीचे छिपना पड़ता था। सोचिए, हिमालय की हड्डी जमा देने वाली ठंड में ईंधन से भरे टैंकर के नीचे एक इंसान को छुपना पड़ता था।
ड्राइवर बेहोश हो गया, मौत के हुये दर्शन
डाइटर के मुताबिक उस समय टैंकरों की केबिन लकड़ी की बनी होती थीं और सबसे ख़तरनाक बात यह थी कि एक्ज़ॉस्ट पाइप सामने की तरफ़ होता था, जिससे केबिन में कार्बन मोनोऑक्साइड भर जाती थी। एक वाकया तो ऐसा था कि गाटा लूप्स के पास ड्राइवर बेहोश हो गया।
तक डाइटर ने खुद स्टेयरिंग संभाली और ड्राईवर को जगाने की कोशिश की। डाइटर लिखते हैं किक कुछ पल के लिए लगा कि यहीं सब खत्म हो जाएगा, लेकिन सूझ- बूझ से हादसा होने से पहले टल गया और सफर ओर रोमांचक हो गया।
छोटा लड़का, बड़ा काम
डाइटर के मुताबिक इन टैंकरों में एक छोटा लड़का भी होता था, जिसकी जिम्मेदारियां सुनकर आज के लोग हैरान रह जाएँगे। इस लड़के का काम ड्राइवर के लिए सिगरेट जलाना, खाना पकाना, हर स्टॉप पर टायरों पर डंडा मारकर प्रेशर जांचना और टायरों में फंसे पत्थर निकालना होता था।
खड़ी चढ़ाई पर रुक- रुख कर चढ़ने अथवा अड़ने पर टैंकर के टायरों के पीछे लकड़ी का गुटखा लगाना और हर रोज टैंकर की साफ सफाई भी उसी छोटे लड़के के जिम्मे थी। टैंकर के साथ यह छोटा लड़का बड़े काम ही काम का होता था।
ज़िंदगी और मौत के बीच झूलता रोमांच
यह कहानी सुनाना इसलिए ज़रूरी है कि आज जब केलंग से लेह तक की यात्रा आरामदायक बसों, लग्ज़री एसयूवी और सोशल मीडिया रील्स में सिमट गई है। अब बहुत कम लोग जानते हैं कि दो दशक पहले यह सफ़र ज़िंदगी और मौत के बीच झूलता रोमांच हुआ करता था।
आज की यवा पीढ़ी जब लेह–लद्दाख को ‘वीकेंड ट्रिप’ समझती है, तब डाइटर क्रूज़े की यह कहानी याद दिलाती है कि एक वह भी दौर था जब पहाड़ों ने रास्ते नहीं दिए, तो धुन के पक्के लोगों ने यात्रा के लिए पहाड़ काट कर रास्ते बनाए।
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