आपदा में सूचना : दुर्गम इलाके बुनियादी ढांचे को मोहताज, सरकारी विभागों में तालमेल खराब, स्थानीय समुदायों की भागीदारी का अभाव

आपदा में सूचना : दुर्गम इलाके बुनियादी ढांचे को मोहताज, सरकारी विभागों में तालमेल खराब, स्थानीय समुदायों की भागीदारी का अभाव
आपदा में सूचना : दुर्गम इलाके बुनियादी ढांचे को मोहताज, सरकारी विभागों में तालमेल खराब, स्थानीय समुदायों की भागीदारी का अभाव
विनोद भावुक। धर्मशाला
बरसात के मौसम में भारी बारिस अथवा बादल फटने से अचानक आने वाली तबाही। पूरा पहाड़ी प्रदेश त्राहि-त्राहि कर उठता है। भूस्खलन से सड़कें बंद, टूटे हुये पल, बाढ़ में बहते घर तथा वाहन और जगह – जगह फंसे हुए लोग। इस मंजर में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है लाखों लोगों तक सही और त्वरित सूचना पहुंचाना।
आपदा के दौरान लोगों तक तत्काल सूचना पहुँचने की राह में आने वाली रुकावटें एक शोध में सामने आई हैं। ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी रिसर्च एंड मैनेजमेंट’ में छपे सौरभ सूद की रिसर्च के मुताबिक दूरदराज के इलाकों में बिजली और इंटरनेट की सीमित पहुंच के कारण ज्यादा असुरक्षित लोगों तक सरकार के डिजिटल संदेश नहीं पहुँच पाते।
कुछ सुझाव, जिनका प्रभाव
बुनियादी ढांचे की कमी, विभिन्न विभागों के बीच तालमेल की कमी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी की कमी अब भी आपदा के समय सही वक्त पर सही सूचना पहुँचाने में बड़ी बाधाएं हैं। शोधपत्र में इस बात को गंभीरता से उठाया गया है। शोधकर्ता सौरभ सूद ने अपने अध्ययन में हिमाचल सरकार को कुछ अहम सुझाव दिए हैं।
उनका कहना है कि सभी विभागों को एक मंच पर लाकर संचार की एकीकृत रणनीति बनानी होगी। केवल ऊपर से नीचे संदेश भेजना काफी नहीं है। स्थानीय लोगों, पंचायतों और स्वयंसेवी संस्थाओं को संचार का हिस्सा बनाना होगा। संकट के समय कैसे बोलना है, क्या जानकारी देनी है, इसके लिए अधिकारियों को विशेष प्रशिक्षण देना होगा।
शोध बताते हैं कि मजबूत और लक्षित संचार से न केवल जनहानि कम होती है, बल्कि सरकार पर जनता का भरोसा भी बढ़ता है। हर संकट के समय, सरकारी तंत्र सूचना प्रसारित करने के लिए कई मोर्चों पर एक साथ काम करता है। सौरभ सूद कहते हैं कि एकतरफा सूचना देने के बजाय, दोतरफा संवाद को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि लोगों की समस्याएं भी सरकार तक पहुंच सकें।
आकाशवाणी और दूरदर्शन पर तत्काल चेतावनी और राहत जानकारी का प्रसारण होता है। सोशल मीडिया और सरकारी ऐप्स के जरिए तेजी से अपडेट दिये जाते हैं। जिला प्रशासन से लेकर पटवारी तक, मौखिक और डिजिटल माध्यमों से गांव-गांव सूचना देते हैं। समय पर सही सूचना प्रदेश के कोने- कोने तक पहुंचाना सरकारी प्रवक्ताओं की ज़िम्मेदारी होता है।
सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के अधिकारी और कर्मचारी आपदा के असली योद्धा हैं। बाहरी दुनिया से संपर्क टूट जाता है, तो ये लोग सूचना की लाइफलाइन बन जाते है। विभाग को अन्य विभागों से तालमेल कर सूचना जुटानी होती है। शोध खुलासा करता है कि सूचना जुटाने में विभागीय तालमेल की कमी, सूचना देने में देरी का कारण बनती है।
संवेदनशील पहाड़ी राज्य हिमाचल में आपदा के बीच सूचना ही सबसे बड़ी राहत बन जाती है। इसे अधिक वैज्ञानिक, समावेशी और मानवीय बनाने की जरूरत है। शोध में केरल सरकार द्वारा कोविड महामारी के दौरान किए गए संचार को एक आदर्श उदाहरण के रूप में पेश किया गया है। प्रदेश सरकार और टॉप ब्यूरोक्रेसी से उम्मीद है कि इस शोध से सबक लेकर जरूरी कदम उठाए जाएँगे।
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Jyoti maurya

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