देवभूमि का दैवीय चमत्कार, सिख धर्म को मिला विस्तार, पहाड़ बने गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोविन्द सिंह जी तक की कर्मभूमि

देवभूमि का दैवीय चमत्कार, सिख धर्म को मिला विस्तार, पहाड़ बने गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोविन्द सिंह जी तक की कर्मभूमि
देवभूमि का दैवीय चमत्कार, सिख धर्म को मिला विस्तार, पहाड़ बने गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोविन्द सिंह जी तक की कर्मभूमि
हिमाचल बिज़नेस डेस्क | धर्मशाला
हिमाचल प्रदेश की पर्वतीय घाटियां देव संस्कृति का केंद्र हैं। ये घाटियां सिख धर्म की नींव और विस्तार का भी गवाह बनीं। तलवंडी से निकले प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी ने जब 1514 ई. में हिमालय की ओर रुख किया, तो यह केवल यात्रा नहीं थी। यह धर्म, शांति और सामाजिक चेतना की वह लहर थी, जिसने सदियों तक इस भूमि को प्रभावित किया।
गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोविन्द सिंह तक, हिमाचल प्रदेश की भूमि ने सिख इतिहास को समृद्ध किया। ज्वालामुखी, रिवालसर, पांवटा साहिब और आनंदपुर जैसे स्थान आज भी इस रिश्ते की जीवंत गवाही हैं।
ज्वालामुखी से मणिमहेश तक
इतिहासकार झोच के अनुसार, गुरु नानक देव जी पंजाब से गुरदासपुर, पठानकोट होते हुए कांगड़ा घाटी पहुँचे। उन्होंने धर्मशाला और चंबा का भ्रमण किया और आगे चलकर भरमौर व पवित्र मणिमहेश भी पहुंचे। इसके बाद वे ज्वालामुखी मंदिर लौटे और फिर कुल्लू घाटी, त्रिलोकीनाथ और मणिकर्ण तक गए।
मंडी व सुकेत की रियासतों से होते हुए गुरु नानक देव जी रिवालसर पहुँचे, जहाँ आज भी उनका स्मरण कराता ऐतिहासिक गुरुद्वारा स्थित है। यह यात्राएँ केवल धार्मिक नहीं थीं, बल्कि सामाजिक समानता और आध्यात्मिक एकता का संदेश लेकर आईं।
मंडी से सिख गुरुओं का नाता
गुरु अर्जुन देव जी ने अमृतसर में हरमंदिर साहिब निर्माण के लिए पहाड़ी रियासतों से सहयोग मांगा। भाई कल्याण को मंडी भेजा गया। मंडी के राजा-रानी ने उनकी मदद की। गुरु हरगोबिंद सिंह जी को कहलूर के राजा ने ज़मीन भेंट की, जिस पर किरतपुर नगर बसा।
गुरु हर राय जी ने 13 वर्ष तक सिरमौर के राजा कर्म प्रकाश के साथ निवास किया। गुरु तेग बहादुर जी को भी कहलूर रियासत की रानी ने आमंत्रित किया। उन्होंने भेंट की जमीन लेने से इंकार कर दिया। उन्होंने इसके लिए भुगतान कर जमीन का प्रस्ताव स्वीकार किया। यही भूमि आगे चलकर आनंदपुर साहिब बनी।
पांवटा से आनंदपुर तक
सिखों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह जी ने हिमाचल प्रदेश में सिख धर्म का वास्तविक विस्तार किया। कहलूर और सिरमौर रियासतों के राजाओं से उनके संबंध युद्धों से जुड़े। सफेद हाथी के विवाद ने उन्हें आनंदपुर छोड़ने पर विवश किया और वे नाहन रियासत में पहुँचे।
राजा मेदनी प्रकाश के निमंत्रण पर वे पांवटा साहिब में रहे, जहाँ उन्होंने तीन वर्ष तक यमुना किनारे किला बनवाकर डेरा जमाया। पांवटा में रहते हुए उन्होंने गढ़वाल और सिरमौर रियासतों के बीच संबंध सुधारे। यही वजह है कि पांवटा आज सिखों का महान तीर्थस्थल है।
जैसे बची हंडी, वैसे बचेगी मंडी
गुरु गोविन्द सिंह जी के मंडी प्रवास के दौरान राजा सिद्धसेन ने उनसे आशीर्वाद मांगा कि उसकी रियासत पर कभी शत्रु का कब्ज़ा न हो। गुरु गोविन्द सिंह जी ने ज़मीन पर हांडी पटक कर कहा –“जैसे बची यह हंडी, वैसे बचेगी मंडी।
गुरु गोविन्द सिंह जी ने यह भी कहा था, जो मंडी को लुटेंगे, उन पर आसमानी गोले छूटेंगे। आज भी मंडी- कुल्लू रोड पर मंडी बस स्टैंड के पास स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री गुरु गोविन्द सिंह जी इस आशीर्वाद की गवाही देता है।
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Jyoti maurya

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