फांसी के सजा पाया जेल से फरार कैदी दीवान मोखिम चंद, जिसने महाराजा रणजीत सिंह का सेनापति बन, जीत कर दी तीन रियासतें
फांसी के सजा पाया जेल से फरार कैदी दीवान मोखिम चंद, जिसने महाराजा रणजीत सिंह का सेनापति बन, जीत कर दी तीन रियासतें
विनोद भावुक। धर्मशाला
महाराजा रणजीत सिंह के सबसे प्रतिष्ठित सेनापतियों में दीवान मोखिम चंद एक ऐसी नाम है, जिन्होंने सिख साम्राज्य को मजबूत करने में एक प्रमुख भूमिका निभाई और एक सक्षम कमांडर, और रणनीतिकार के रूप में उभरे। मोखिम चंद ने 1812–13 के आसपास जसरोटा, चंबा और बसोहली जैसी रियासतों के राजपूत सरदारों से मात दी।
दरअसल, मोखिम चंद एक मिसल की जेल से भाग वे कैदी थे, जिन्हें फांसी दी जाने वाली थी। मिसल के सरदार की पत्नी की मदद से फांसी दिये जाने से पहले फरार हो गए, महाराजा रणजीत सिंह ने उन पर भरोसा जताया और तीन पहाड़ी रियासतों को जीत कर वे इस भरोसे पर खरा उतरे।
सिखों को सरहदी इलाकों में दी मजबूती
सिख साम्राज्य ने 18वीं सदी के अंतिम हिस्से में पंजाब से बढ़ते हुए कई पहाड़ी क्षेत्रों को भी अपने प्रभाव में ले लिया, जहां स्थानीय राजपूतों और रियासतों के साथ आए दिन संघर्ष और राजनीतिक समझौते होते रहे। मोखिम चंद जैसे सेनापति इस विस्तार की मुख्य हस्तियों में शामिल रहे।
उनकी सैन्य सूझ बूझ और युद्ध कौशल से सिख सेना ने पहाड़ी इलाकों की कठिन भू रचना में भी सफलता हासिल की। उन्होंने 1813 में अफ़गानों से अटॉक का भगवाड़ा जीतकर सिखों को सरहदी इलाकों में मजबूती दी। इसी जीत ने सामरिक दृष्टि से पहाड़ी रियासतों को जीतने के लिए आने वाले सिख अभियानों को और मजबूत किया।
सेना के मोर्चे पर तीन पीढ़ियां
मोखिम चंद का जन्म 1750 में गुजरात के कुंजराह गांव में एक हिन्दु खत्री परिवार में हुआ था। सैन्य कमांडर और रणनीतिकार के तौर पर सिख सेना में बड़ा मुकाम हासिल किया और कई सैन्य अभियानों की व्यूहरचना की। उनकी मौत अक्टूबर 1814 में सिख साम्राज्य के अधीन आते में फिल्लौर में हुई थी।
महाराजा रणजीत सिंह के शासन और सिख साम्राज्य को लेकर लिखी गईं सभी पुस्तकों में मोखिम चंद के सैन्य जीवन के बारे में खूब लिखा गया है। यह भी सिख साम्राज्य के इतिहास में दायर है कि उनके बेटे दीवान मोती राम और पौत्र दीवान किरपा राम ने भी कश्मीर जैसे प्रमुख क्षेत्रों में प्रशासनिक व सैन्य ज़िम्मेदारियाँ निभाईं।
जेल से भगोड़े को महाराजा ने दी नौकरी
महाराजा रणजीत सिंह के पास नौकरी से पहले उन्होंने 1804 तक अकालगढ़ के दल सिंह गिल के पास मुंशी के तौर पर काम किया था। दल सिंह की मौत के बाद 1804-1806 के बीच भंगी मिसल के साहिब सिंह भंगी के साथ काम किया। उन्हें भंगी मिसल के दीवान के पद पर नियुक्त किया गया था।
दीवान मोखिम चंद भंगी मिसल के लोगों की नज़रों से गिर गए। उन्हें जेल भी भेज दिया गया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। साहिब सिंह की पत्नी चांद कौर ने उन्हें भागने में मदद करके उनकी जान बचाई। भंगी मिसल से भागने के बाद 1806 में उन्हें महाराजा रणजीत सिंह के अंडर काम मिला।
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