पहाड़ी ग़ज़ल के सबसे बड़े शायर, कांगड़ा से ज्यादा चंबा और मंडी में डॉ. प्रेम भारद्वाज को चाहने वालों की तादाद
पहाड़ी ग़ज़ल के सबसे बड़े शायर, कांगड़ा से ज्यादा चंबा और मंडी में डॉ. प्रेम भारद्वाज को चाहने वालों की तादाद
विनोद भावुक। नगरोटा बगवां
नगरोटा बगवां के स्वर्गीय डॉ. प्रेम भारद्वाज (25 दिसंबर 1946 — 13 मई 2009) हिमाचल प्रदेश की साहित्यिक धरती के वे ऐसे दीपक रहे, जिनकी ग़ज़ल में पहाड़ों की हवा, लोक-कथाओं और प्रशासनिक अनुभव, सभी का अनूठा मिश्रण सुनाई देता है। शिक्षा जगत और प्रशासनिक सेवा में उनका नाम सम्मान से लिया जाता है और पहाड़ी बोली में लिखा उनका काव्य आज भी सर्वश्रेष्ठ, पठनीय और प्रेरक माना जाता है।
डॉ. प्रेम भारद्वाज का जीवन दो सिरे रखता था। एक सरकारी अधिकारी के कर्तव्य और दूसरी ओर सृजन प्रधान कवि का अंतर्मुख। इस शायर ने प्रदेश प्रशासनिक सेवाओं में जितना योगदान दिया, उतना की पहाड़ी के सृजन को समर्पित रहे। उनकी यह डुअल जिंदगी ही उनकी गजलों में संवेदनशीलता और सामाजिक जागरूकता ला पाई।
हिन्दी- पहाड़ी में लेखन
उनकी प्रमुख काव्य कृतियों में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं ‘मौसम मौसम’, ‘मौसम खराब है’, ‘अपनी ज़मीन से’ तथा लोककथा-आधारित शोध ‘लोककथा मानस’। 2002 में प्रकाशित ‘मौसम मौसम’ ग़ज़ल संग्रह में कई ऐसे पद मिलते हैं, जो सामाजिक चिंताओं और मानव-संवेग का संयुक्त रूप प्रस्तुत करते हैं। ये संग्रह कविता कोश पर भी उपलब्ध हैं और उनकी कई ग़ज़लें वहां संकलित हैं।
प्रेम भारद्वाज ने पहाड़ी मुहावरे, लोक-शब्द और हिंदी-पहाड़ी की शायरी को एक साथ बांधा। उनकी ग़ज़लों में पहाड़ी संस्कृति के दृश्य बर्फ, देवदार, गांव की चौपाल और शहरी चेतना का टकराव साफ़ दिखाई देता है। उनके कुछ शेरों में प्रकृति-चित्रण की सरलता और संवेदना दोनों दिखती है।

परंपराओं और सांस्कृतिक स्मृतियों के संरक्षक
प्रेम भारद्वाज की रचनाएं लोककथाओं और लोकजीवन से गहरे जुड़ी हुई हैं, इसलिए पाठक को पहाड़ के जीवन की गंध मिलती है। पहाड़ी शब्दों का सहज प्रयोग उनकी भाषा को विशिष्ट बनाता है। इन कारणों से साहित्यिक समीक्षक और स्थानीय पाठक समूह उन्हें पहाड़ी ग़ज़ल-परंपरा का एक मानक शायर मानते हैं।
डॉ. प्रेम भारद्वाज सिर्फ कवि / शायर नहीं थे। उन्होंने लोककथाओं और समाजशास्त्रीय दृष्टि से भी काम किया। उनका शोधात्मक कार्य ‘लोककथा मानस’ बताता है कि वे न केवल काव्य-सौंदर्य, बल्कि किंवदंतियों, परंपराओं और सांस्कृतिक स्मृतियों के संरक्षक भी रहे।
सम्मान, विमोचन और बाद की स्मृतियां
मृत्यु के 14 साल बाद साल 2023 में उनके नवीनतम संकलन ‘धुडू’ का नगरोटा बगवां में विमोचन हुआ। यह दर्शाता है कि उनकी साहित्यिक धरोहर को आज भी सक्रिय रूप से जिया और पढा जाता है। पहाड़ी बोली में लिखकर डॉ. प्रेम ने स्थानीय पहचान को साहित्यिक मान्यता दी। लोककथा-शोध और शायरी का मेल भविष्य के लेखकों के लिए मॉडल है।
प्रशासनिक अनुभव ने उनकी ग़ज़लों को सामाजिक-राजनीतिक धार दी। यही लेखन को आज भी प्रासंगिक बनाता है। डॉ. प्रेम भारद्वाज की रचनाएँ समय के साथ और भी प्रासंगिक दिखाई देती हैं क्योंकि वे पहाड़ों की रोज़मर्रा की पीड़ा, आनंद और सामाजिक-राजनीतिक चिंताओं को सीधे, सरल और असरदार भाषा में व्यक्त करते हैं। नये लेखक और शोधार्थी उनसे प्रेरणा लेते हैं।
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