गुरबख्श सिंह कन्हैया के जागीर के प्रस्ताव के चलते जीवन ख़ान ने सिख सेनाओं के लिए खोल दिया कांगड़ा किला
गुरबख्श सिंह कन्हैया के जागीर के प्रस्ताव के चलते जीवन ख़ान ने सिख सेनाओं के लिए खोल दिया कांगड़ा किला
विनोद भावुक। कांगड़ा
कांगड़ा किला केवल एक दुर्ग नहीं था, यह पहाड़ी इलाकों की राजनीतिक और सैन्य कुंजी माना जाता था। 1783 में कांगड़ा के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ आया। कांगड़ा के राजा संसार चंद कटोच ने सिख शक्ति की मदद से कांगड़ा किले को मुगलों से जीतने की योजना बनाई। कन्हैया मिसल के संस्थापक जय सिंह कन्हैया ने इस अभियान की ज़िम्मेदारी अपने पुत्र गुरबख्श सिंह को सौंपी।
किले की रक्षा कर रहे अफ़ग़ान सेनापति सैफ़ अली ख़ान की मृत्यु के बाद उसके पुत्र जीवन ख़ान ने मोर्चा संभाला। यहां गुरबख्श सिंह केवल योद्धा नहीं, बल्कि रणनीतिकार बनकर उभरे। उन्होंने समझा कि हर युद्ध तलवार से नहीं, बुद्धि से भी जीता जाता है। उन्होंने जीवन ख़ान से बातचीत कर उसे जागीर और धन का प्रस्ताव दिया और कांगड़ा किला सिख सेनाओं के लिए खोल दिया गया।
सिख मिसलों की रणनीति का केंद्र कांगड़ा
18वीं शताब्दी में कांगड़ा का इलाका सिख मिसलों की रणनीति, साहस और राजनीतिक सूझ-बूझ का बड़ा केंद्र रहा है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में थे गुरबख्श सिंह कन्हैया, जिनका जीवन भले ही छोटा रहा, लेकिन उनका प्रभाव आज भी कांगड़ा के इतिहास में गूंजता है। इतिहास गवाही देता है कि गुरबख्श सिंह ने छोटे से काल में बड़ा नाम कमाया था।
कांगड़ा किले पर अधिकार के बाद गुरबख्श सिंह ने अपनी सत्ता को कांगड़ा से लेकर पालमपुर तक फैला दिया। यह पहली बार था जब पहाड़ी क्षेत्रों में सिख मिसलों का प्रभाव इतने संगठित रूप में स्थापित हुआ कि पालमपुर जैसे कांगड़ा जिला के इलाक़े उत्तर भारत की बड़ी राजनीति से सीधे जुड़ गए। उस दौर में पालमपुर इलाका सिख-पहाड़ी शक्ति संतुलन का अहम हिस्सा था।
मौत ने दिया इतिहास को नया मोड़
लगभग 1759 में अमृतसर के लील गांव में जन्मे गुरबख्श सिंह, कन्हैया मिसल के संस्थापक सरदार जय सिंह कन्हैया के पुत्र थे। बचपन से ही उन्हें युद्ध, राजनीति और कूटनीति का प्रशिक्षण मिला।
कम उम्र में ही उनका विवाह सदा कौर से हुआ। सदा कौर आगे चलकर पंजाब की राजनीति की सबसे शक्तिशाली महिलाओं में गिनी गईं।
सिख मिसलों कन्हैया मिसल और सुक्करचकिया मिसल के बीच संघर्ष के चलते दुर्भाग्य से,1785 में मात्र 25–26 वर्ष की आयु में गुरबख्श सिंह कन्हैया की मौत एक युद्ध में हो गई। उनकी मौत ने इतिहास को एक नया मोड़ दिया। गुरबख्श सिंह के बाद उनकी पत्नी सदा कौर ने कन्हैया मिसल की कमान संभाली। उनकी पुत्री मेहताब कौर का विवाह आगे चलकर महाराजा रणजीत सिंह से हुआ।
न नेतृत्व उम्र का मोहताज, न पहाड़ भौगोलिक सीमाएं
गुरबख्श सिंह कन्हैया के प्रयास से ही सिख साम्राज्य की नींव मज़बूत हुई कांगड़ा और पालमपुर जैसे क्षेत्र पंजाब की मुख्यधारा राजनीति से जुड़े कहा जाए तो, गुरबख्श सिंह कन्हैया का कांगड़ा अभियान ही महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य विस्तार की प्रस्तावना था। कांगड़ा और पालमपुर में वह इतिहास सांस लेता है, जिसे गुरबख्श सिंह कन्हैया ने अपने साहस और दूरदर्शिता से रचा।
गुरबख्श सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि न नेतृत्व उम्र का मोहताज नहीं होता और न पहाड़ केवल भौगोलिक सीमाएं होती हैं। नेतृत्व क्षमता से पहाड़ भी सियासत के लिए रणनीतिक अवसर भी होते हैं। चोटी उम्र में बड़ा कारनामा करने वाले गुरबख्श सिंह कन्हैया का व्यक्तित्व सिखाता है कि इतिहास अक्सर उन लोगों को याद रखता है, जिन्होंने कम समय में बड़ा प्रभाव छोड़ा हो।
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