शिमला की गलियों में सीखी कढ़ाई, डायना स्प्रिंगॉल की लंदन तक चढ़ाई
शिमला की गलियों में सीखी कढ़ाई, डायना स्प्रिंगॉल की लंदन तक चढ़ाई
विनोद भावुक। शिमला
हिमालय की गोद में बसा शिमला सिर्फ़ पहाड़ों और विरासत का शहर नहीं, बल्कि ऐसी प्रतिभाओं की जन्मभूमि भी है, जिन्होंने दुनिया की कला-दृष्टि बदल दी। ऐसी ही एक नाम है डायना स्प्रिंगॉल। वे विश्व की सबसे प्रतिष्ठित टेक्सटाइल आर्टिस्ट्स में गिनी जाती हैं, लेकिन कम ही लोग जानते हैं किक उनकी रचनात्मक यात्रा की शुरुआत शिमला से ही हुई थी।
डायना की मां स्टेला फुलर स्वयं एक कुशल नीडलवर्क आर्टिस्ट थीं। शिमला में घरेलू कढ़ाई, कपड़ों की सिलाई और धागों से खेलने का अनुभव ही आगे चलकर डायना की पहचान बना। यही कारण है कि वे खुद मानती हैं कि शिमला में सीखी गई शुरुआती सिलाई ने उनके व्यक्तित्व और कला की दृष्टि को नया आकार दिया।
घरेलू हुनर को ‘फाइन आर्ट’ का दर्जा
16 सितंबर 1938 को ब्रिटिश शिमला में जन्मीं डायना स्प्रिंगॉल (तत्कालीन नाम डायना अलेक्ज़ेंडर) का बचपन औपनिवेशिक शिमला की शांत वादियों में बीता। उनके पिता गॉर्डन अलेक्ज़ेंडर, भारतीय सिविल सेवा में अंडर सेक्रेटरी थे। घर में आया, गवर्नेस और सीमित सामाजिक दायरे के बीच पली-बढ़ी डायना ने बहुत कम उम्र में ही चित्रकारी और कढ़ाई में अपना मन लगा लिया।
देश के आजाद होने पर 1947 में भारत छोड़कर ब्रिटेन जाने के बाद भी शिमला की स्मृतियां उनके रचनात्मक संसार में लगातार जीवित रहीं। ब्रिटेन में लंदन यूनिवर्सिटी के गोल्डस्मिथ्स कॉलेज, से कला शिक्षा लेने के बाद डायना स्प्रिंगॉल ने वह कर दिखाया, जो उस दौर में असंभव माना जाता था। उन्होंने कढ़ाई को घरेलू हुनर से निकालकर ‘फाइन आर्ट’ का दर्जा दिलाया।
डायना स्प्रिंगल कलेक्शन दुनिया का फेमस ब्रांड
डायना स्प्रिंगॉल एंब्रोडर्स गाइड सोसायटी ऑफ डिजायनर्स क्राफ्टमेन की चेयरपर्सन रहीं और जीवनभर इस बात के लिए संघर्ष किया कि कढ़ाई को भी पेंटिंग और स्कल्पचर के बराबर सम्मान मिले। 1964 से शुरू किया गया डायना स्प्रिंगल कलेक्शन आज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण कढ़ाई संग्रहों में से एक है। इस संग्रह में 1960 के दशक से लेकर टेक्सटाइल आर्ट शामिल है।
डायना स्प्रिंगॉल को 2018 में फ़्रीडम ऑफ द सिटी ऑफ लंदन, 2025 में यूनिवर्सिटी पीएफ़ शेफ़्फील्ड ओरनारी डॉक्टर पीएफ़ लेटर्स जैसे सम्मान दिये हैं। विक्टोरिया एंड अलवर्ट म्यूजियम में उनका संग्रह स्थायी तौर पर प्रदर्शित किया गया है। कभी शिमला की गलियों में सीखी हुई घरेलू कला भी विश्व मंच पर इतिहास रच रही है।
शिमला की विरासत की अंतरराष्ट्रीय पहचान
आज 80 से अधिक उम्र में भी डायना स्प्रिंगॉल सक्रिय हैं, कलाकारों को मार्गदर्शन देती हैं और कढ़ाई को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में जुटी हैं। डायना स्प्रिंगॉल का मानना है कि कला को सिर्फ़ देखा नहीं जाना चाहिए, उसे महसूस भी किया जाना चाहिए। वे सिर्फ़ ब्रिटिश टेक्सटाइल आर्टिस्ट नहीं, बल्कि शिमला की सांस्कृतिक विरासत की अंतरराष्ट्रीय पहचान हैं।
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