नवीन हलदूणवी की उस पहाड़ी कविता में महसूस कीजिये कांगड़ा की सबसे उपजाऊ हलदूण घाटी के डूब जाने का दर्द
नवीन हलदूणवी की उस पहाड़ी कविता में महसूस कीजिये कांगड़ा की सबसे उपजाऊ हलदूण घाटी के डूब जाने का दर्द
अरविंद शर्मा, धर्मशाला
पौंग डैम… विकास की बड़ी पहचान, लेकिन इसके साथ जुड़ी है दर्द की ऐसी दास्तान जिसे सुनकर आज भी आंखें नम हो जाती हैं।
हलदूण घाटी — उपजाऊ खेतों से भरी, हरियाली से लहराती, खुशहाल घरों से सजी इस घाटी को 1970 के दशक में डूबना पड़ा। खेतों में उगती लहलहाती फसलें, बहती कुलहों का मीठा पानी, ढोल-नगाड़ों से गूंजते मेले… सब कुछ डूब गया डैम के गहरे पानी में।
लोग अपने ही घरों को रो-रोकर तोड़ते थे, सामान निकालते और डूबते खेतों को आखिरी बार निहारते। माएँ अपने बच्चों को सीने से लगाकर आंसुओं में भीग जातीं। बेटियाँ अपने आँगन को छोड़ने से पहले मिट्टी की मुट्ठी भर लेतीं।
कवि स्वर्गीय विशंभर शर्मा “नवीन हलदूणवी” इसी पीड़ा के गवाह रहे। उनका गांव पंजराल भी 1974 की भारी बारिश के बाद सदा के लिए पानी में समा गया। उन्होंने लिखा था –
“नवीन जाल्हू औऐ याद अक्खीं रोज़ बग्गदा,
डुब्बियो हलदूण दिक्खी, जीणा खोट्टा लग्गदा।”
यह पंक्तियाँ सिर्फ़ कविता नहीं, बल्कि उस टीस की गवाही हैं जो विस्थापन ने हलदूण घाटी के हर इंसान के दिल में छोड़ दी।
बेशक सरकार ने विस्थापितों को मुआवजा दिया, राजस्थान में ज़मीनें अलॉट कीं, लेकिन क्या मातृभूमि से बिछड़ने का दर्द कभी मिट सकता है?
क्या पैसे से उस घर की यादें खरीदी जा सकती हैं, जहाँ माँ के हाथों की रोटियों की खुशबू थी, और पिता की मेहनत से खड़ी फसलें झूमती थीं?
आज भी पौंग डैम का पानी चमकता है, पर उसकी गहराइयों में हलदूण घाटी की वो अनगिनत कहानियाँ दफ़न हैं, जिन्हें इतिहास ने कभी पूरी तरह दर्ज नहीं किया।
यह सिर्फ़ विस्थापन नहीं, यह एक पूरा जीवन था… जो पानी में डूब गया। पहाड़ी कविता में तरोताजा हलदूण का दर्द –
हलदूणी साईं मौज़ कुथू, रोई बोल्लै छुणकू।
था अन्न धन घियो -दुद, लूण दिंदा लूणसू ।।
भई कूहलां दा पाणी डक्की लग्गै जाल्हू सेड़।
तांईं कणकां दा क्यारुआं च लग्गदा है ढेर।।
मियो गंढुआं टमाटरां दा सच्ची घर डूहक।
थे खांदे-पींदे रली मिली खरा हा सलूक ।।
जित्थू कम्म कित्ता हत्थ लेई खुरपे ते डाटियां।
अज्ज पाणियें च डुब्बियां सैह डल कनैं भाटियां ।।
तिल्लां-सरूंआ दी खेत्ती करी मिलदा है तेल।
तित्थू छक्क-छक्क-छक्क चलदी है रेल।।
देहर गज्ज बूहल बगै ब्यासा ते बंडेर।
सुरग होया नरक अज्ज दिनां दे न फेर ।।
पंजी दा है पंज दिन मेला तित्थू लग्गदा ।
था टमक-टमक करी ढोल ताल्हू बज्जदा ।।
बिकदे हे मेले च धधूनू कनैं चाटियां ।
चौंईं बक्खैं प्हाड़ां च हलदूण दीयां घाटियां।।
बरखा थी पौंदी जाल्हू खड्ड ‘मीनूं’ सूंकदी ।
टरनटरां मीनकां दी तलाटुए च गूंजदी ।।
झीरैं बी तां पकडिय़ो जले दी सैह जलकी।
छिक्कु एच पाई करी गल्ल करै गरकी।।
बबरु तलोंदे कुथी पकोड़ू कुथी पकादे।
थे रलीमिली बंडी-चुंडी सब्बो बैठी चक्खदे।।
भ्यागा उट्ठी सूरज बी जित्थू मारै झातियां ।
अज्ज पाणियें च डुब्बियां सैह् डल कनैं भाटियां।।
माड़ा-रीड़ा छाई लैंदा खड़ेह् दा हा टप्परू।
थे घर-घर बाड़छां च मिली जांदे लकड़ू ।।
गुआल़ू बी तां तित्थू सच्ची डंगरेयां चारदे।
थे दाणे-रोटी लेई करी टब्बरां जो पाल़दे ।।
“नवीन” जाल्हू औऐ याद अक्खीं रोज़ बग्गदा ।
डुब्बियो हलदूण दिक्खी जीणा खोट्टा लग्गदा ।।
हुण छम-छम चारैं रोण अम्मा कनैं चाचियां।
अज्ज पाणियें च डुब्बियां सैह् डल़ कनैं भाटियां।।
