डगशाई से पचास साल बाद आयरलैंड भेजी गईं आयरिश क्रांति के शहीद जेम्स डेली की अस्थियां
डगशाई से पचास साल बाद आयरलैंड भेजी गईं आयरिश क्रांति के शहीद जेम्स डेली की अस्थियां
विनोद भावुक। डगशाई
सोलन की शांत पहाड़ियों में स्थित डगशाई अपने भीतर औपनिवेशिक भारत की एक ऐसी कहानी छुपाए बैठा है, जिनकी गूंज भारत से कहीं दूर आयरलैंड तक सुनाई देती है। इतिहास के पन्नों में यह दर्ज है कि डगशाई से पचास साल बाद आयरिश क्रांति के शहीद जेम्स डेली की अस्थियां आयरलैंड भेजी गईं थीं। आयरलैंड में डेली को राष्ट्रीय शहीद माना जाता है, जिन पर गीत लिखे गए हैं।
2 नवंबर 1920 को डगशाई सैन्य जेल में जेम्स डेली को गोली मार कर फांसी दी गई थी। वे ब्रिटिश सेना के अंतिम सैनिक बने, जिन्हें विद्रोह के आरोप में गोली मारकर मौत की सजा दी गई। डगशाई छवानी में उनका अंतिम संस्कार किया गया। 1970 में, आयरिश क्रांति की 50वीं वर्षगांठ पर जेम्स डेली के पार्थिव अवशेष आयरलैंड ले जाए गए और राजकीय सम्मान के साथ डबलिन के ग्लास्नेविन कब्र में दफनाया गया।
19 सैनिकों को मौत की सज़ा, 59 को आजीवन कारावास
1919–1921 के बीच आयरलैंड में आजादी के लिए आयरिश क्रांति चल रही थी। क्रांति को कुचलने के लिए ब्रिटिश सेना और कुख्यात ब्लैक एंड टाँस द्वारा आयरिश नागरिकों पर किए जा रहे अत्याचारों की खबरें भारत में तैनात आयरिश सैनिकों तक पहुंची। जून 1920 में जालंधर, सोलन और जतोग में तैनात आयरिश सैनिकों ने विरोध का बिगुल बजा दिया।
सोलन में विद्रोह का नेतृत्व जेम्स डेली ने किया। आयरिश सैनिकों ने अपनी बैरेक को ‘लिबर्टी हाल’ का नाम दिया और उस पर आयरिश तिरंगा फहराया। ब्रिटिश सेना ने विद्रोह को कुचल दिया। 19 आयरिश सैनिकों को मौत की सज़ा और 59 को आजीवन कारावास दिया गया। कई सैनिकों को पेंशन से वंचित कर दिया गया। 18 सैनिकों की मौत की सज़ा माफ कर दी गई, लेकिन जेम्स डेली की सज़ा माफ़ नहीं की गई।
डगशाई की सैन्य छावनी और मिलिट्री जेल
ब्रिटिश काल में डगशाई को सैन्य छावनी और मिलिट्री जेल के रूप में विकसित किया गया था। यहां ब्रिटिश राज विरोधी गतिविधियों के आरोपी कई भारतीय और विदेशी सैनिकों को बंदी बनाकर रखा गया गया था। इसी जेल में आयरलैंड से आए कनाट रेंगर्स रेजिमेंट के बहुत से विद्रोही सैनिकों को भी कैद किया गया, जिन्हें कई तरह की यातनाएं दी जाती थीं।
2 नवंबर 1920 को डगशाई सैन्य जेल में फायरिंग स्क्वॉड के सामने जेम्स डेली को खड़ा किया गया।
तब उस कारांतिकारी ने कहा था कि उसका विवेक उसे कभी दोषी नहीं ठहराएगा। विद्रोह के आरोप में उन्हें गोली से उड़ा दिया गया और आजादी की एक विदेशी चिंगारी शहीद होकर अमर हो गई, पर उनकी शहादत की गूंज आयरलैंड तक सुनाई दी।
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