प्रथम एंग्लो- सिख युद्ध : भीतरघात और नेतृत्व संकट के चलते कमजोर पड़े सिख, कांगड़ा किले पर हो गया अंग्रेजों का कब्जा
प्रथम एंग्लो- सिख युद्ध : भीतरघात और नेतृत्व संकट के चलते कमजोर पड़े सिख, कांगड़ा किले पर हो गया अंग्रेजों का कब्जा
विनोद भावुक। धर्मशाला
धौलाधार के आंचल में बसा कांगड़ा भारतीय इतिहास का वह अध्याय है , जहां साम्राज्य, रणनीति और विश्वास की परीक्षा हुई। पहले एंग्लो –सिख युद्ध के दौरान 1846 में कांगड़ा किला एक बार फिर इतिहास के केंद्र में आया, जहां सिख विरासत, ब्रिटिश साम्राज्य की विस्तारवादी नीति और पहाड़ी रियासतों की सियासत आपस में टकराईं।
कांगड़ा किला सदियों से उत्तर भारत का सबसे दुर्गम और प्रतिष्ठित किला रहा है। मुग़ल काल से लेकर महाराजा रणजीत सिंह के युग तक, यह किला शक्ति का प्रतीक बना रहा। रणजीत सिंह के समय सिख सत्ता का विस्तार पहाड़ियों तक हुआ और कांगड़ा सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र बना।
पहली बार पहाड़ चढ़ी ब्रिटिश सेना
लाहौर और सतलुज के मैदानों में मुडकी, फ़िरोज़शाह, अलीवाल, सोबराओं की निर्णायक लड़ाइयों के बाद एंग्लो- सिख युद्ध की आंच पहाड़ी रियासतों तक आ पहुंची। अप्रैल–मई 1846 में कांगड़ा किले की घेराबंदी हुई। ब्रिटिश सेना ने पहली बार मैदान से निकलकर पहाड़ी दुर्ग पर सीधा दबाव बनाया।
ब्रिटिश अधिकारी हेनरी लॉरेंस 3 मई 1846 को कांगड़ा पहुंचे। सीमित संसाधनों के बावजूद ब्रिटिश टुकड़ियों ने कांगड़ा घाटी पर नियंत्रण बढ़ाया और आखिरकार 28 मई 1846 को कांगड़ा किला अंग्रेजों के कब्जे में आ गया। इस युद्ध ने कांगड़ा घाटी की दिशा बदल दी।
कांगड़ा पर हो गया अंग्रेजों का कब्जा
कांगड़ा की लड़ाई में मैदानों जैसी विशाल सेनाएं नहीं थीं, पर रणनीति निर्णायक बनी। पहाड़ी भूगोल, आपूर्ति मार्ग और स्थानीय सहयोग, इन सबका उपयोग ब्रिटिश पक्ष ने कुशलता से किया। दूसरी ओर, सिख शक्ति पहले ही निर्णायक मैदानों में कमजोर पड़ चुकी थी। भीतरघात और नेतृत्व संकट ने सिखों के प्रतिरोध को सीमित कर दिया।
9 मार्च 1846 को लाहौर संधि के बाद की व्यवस्थाओं के तहत कांगड़ा सहित कई जिले ब्रिटिश नियंत्रण में आए। इससे न केवल सिख साम्राज्य की सीमाएं सिमटीं, बल्कि पहाड़ी राजनीति में भी ब्रिटिश प्रशासन की गहरी छाप पड़ी। जो कांगड़ा कभी स्वायत्त शक्ति का प्रतीक था,अब ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की परिधि में आ गया।
किले के पत्थरों में इतिहास की गूंज
कांगड़ा किला खंडहर नहीं, स्मृति स्थल है, जहां पत्थरों पर इतिहास की गूंज सुनाई देती है। यह हमें सिख विरासत की दृढ़ता, पहाड़ी समाज की जिजीविषा और इतिहास से सीख लेने की प्रेरणा देता है कि सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण एकता और नेतृत्व होते हैं।
जोसेफ डेवी कनिंघम 1849 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘ हिस्ट्री ऑफ सिख्स’ में लिखते हैं कि कांगड़ा, प्रथम एंग्लो –सिख युद्ध की इकलौती पहाड़ी लड़ाई का केंद्र रहा। 1846 की ब्रिटिश घेराबंदी ने कांगड़ा घाटी की राजनीतिक दिशा पूरी तरह से बदल दी। इस युद्ध में रणनीति, भूगोल और नेतृत्व निर्णायक कारक बने।
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