बिलासपुर से रियासत की कहानी, लंदन तक विरासत की निशानी, राजसी दौर में ‘कलहूर’ में लोकतंत्र की स्थापना करने वाले बिरले राजा सर आनंद चंद
बिलासपुर से रियासत की कहानी, लंदन तक विरासत की निशानी, राजसी दौर में ‘कलहूर’ में लोकतंत्र की स्थापना करने वाले बिरले राजा सर आनंद चंद
विनोद भावुक। बिलासपुर
सतलुज के किनारे बसे बिलासपुर की धरती ने एक ऐसे शासक को जन्म दिया, जिसने राजशाही और लोकतंत्र के बीच पुल का काम किया। ‘कलहूर’ के राजा सर आनंद चंद (1913–1983) की जीवन यात्रा बिलासपुर की पहाड़ी चेतना से शुरू होकर लंदन तक पहुंची, लेकिन उनकी पहचान हमेशा जनता के बीच एक जुड़ी रही।
परंपरा से परिवर्तन की पहल
एक राजा जो सिरों पर राज करने के बजाए दिलों पर राज करना जानता था। 9 जनवरी 1933 को सिंहासन संभालते ही आनंद चंद ने सुधारों का रास्ता चुना। 1936 में बेगार प्रथा समाप्त की, जो पहाड़ों में श्रम की आज़ादी का ऐतिहासिक कदम था।
बाल विवाह पर रोक लगी और 1938 में वयस्क मताधिकार के आधार पर पंचायत चुनाव हुए और रियासत में लोकतंत्र की बुनियाद रखी गई। 1939 में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग कर उन्होंने प्रशासनिक सुधार की मिसाल पेश की।
संविधान सभा के सदस्य रहे
देश की आज़ादी के बाद देश को दिशा देने में उनकी भूमिका शानदार रही। आनंद चंद संविधान सभा के सदस्य बने। वे 1948–1950 तक बिलासपुर के मुख्य आयुक्त रहे। बिलासपुर का हिमाचल प्रदेश में विलय उनकी दूरदर्शिता का परिणाम था।
आनंद चंद लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। हिमाचल प्रदेश और बिहार से दो बार राज्यसभा में पहुंचे। वे हिमाचल प्रदेश विधानसभा के लिए विधायक भी चुने गए। राजा से सांसद और विधायक बनने की उनकी यह यात्रा भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता को दर्शाती है।
लंदन तक रसूख, जड़ों से जुड़ाव
दूसरे विश्वयुद्ध में योगदान के लिए 1945 में आनंद चंद को केसीआईई सम्मान मिला। 1971 के बाद वे परिवार सहित लंदन चले गए, पर हिमाचल प्रदेश से उनका नाता बना रहा। वे इतने लोकप्रिय थे कि 1977 में हिमाचल प्रदेश विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए।
12 अक्टूबर 1983 को लंदन में निधन हुआ, लेकिन अंतिम संस्कार सतलुज के तट पर हुआ, जहां से उनकी कहानी ने आकार लिया था। राजा आनंद चंद की जीवन गाथा बताती है कि असली महानता सत्ता में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों में होती है।
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