‘हिमालयन क्राफ्ट’ से ‘हिमाचल बॉक्स’ तक, कुल्लू के किरण ठाकुर की पहाड़ी उड़ान, जिसने हाथों के हुनर का डाला असली मोल
‘हिमालयन क्राफ्ट’ से ‘हिमाचल बॉक्स’ तक, कुल्लू के किरण ठाकुर की पहाड़ी उड़ान, जिसने हाथों के हुनर का डाला असली मोल
हिमाचल बिजनेस। कुल्लू
कुल्लू की वादियों में पला-बढ़ा एक लड़का देखता था कि गांव की महिलाएं दिन-रात ऊन कातती हैं, शॉल बुनती हैं, उनके हाथों से हुनर बहता है, लेकिन मेहनत की पूरी और असली कीमत कभी उनके हाथों तक नहीं पहुंचती। महिलाओं को उनके हुनर का असली मोल कैसे मिले, कभी यह सिर्फ़ एक ख़ामोश सवाल था, जिसके जवाब की तलाश थी।
टूरिज़म में एमबी कुल्लू के किरण ठाकुर के पास मुंबई और दिल्ली में कॉरपोरेट दुनिया की दो साल की नौकरी का अनुभव था, लेकिन दिल पहाड़ों में ही अटका रहा। उनकी पहाड़ से करीब आने की जिद से जन्म हुआ एक सपने का। साल 2017 में, बिना बड़े निवेश, बिना चमक-दमक वाले दफ़्तर से सिर्फ़ भरोसे के साथ शुरू हुआ हिमालयन क्राफ्ट।
बीस देशों तक पहुंचा हाथों का हुनर
हिमालयन क्राफ्ट के ज़रिये कुल्लू की शॉल, हाथ से बुने मफलर, और पहाड़ी हस्तशिल्प धीरे-धीरे भारत के लगभग सभी राज्यों तक पहुँचे और आज 20 से ज़्यादा देशों में हिमाचल प्रदेश के हथकरघों की पहचान बन चुके हैं। सफ़र आगे बढ़ा, तो सामने आया कि हिमाचल प्रदेश की पहचान सिर्फ़ शॉल तक सीमित नहीं है।
घर का बना अचार, खालिस घी, जंगली शहद, राजमाह, स्थानीय अनाज, और पहाड़ी संस्कृति बाज़ार की भीड़ में खोती जा रही थी। इन्हें बचाने की सोच से जन्म हुआ हिमाचल बॉक्स डॉट कॉम का। ये सिर्फ़ एक वेबसाइट नहीं, एक आंदोलन और एक ऐसा मंच है जहाँ गाँव का किसान, महिला, कारीगर और बुनकर सीधे ग्राहक से जुड़ते हैं।
चलना और साथ चलना
किरण ठाकुर कहते हैं कि हिमालयन क्राफ्ट ने उन्हें चलना सिखाया, और हिमाचल बॉक्स सबको साथ लेकर चलना सिखा रहा है। इरादा साफ़ है कि हर घर के हुनर को सम्मान देना और गाँव को आत्मनिर्भर बनाना। इसी मिशन के साथ हिमाचल बॉक्स का सफर जारी है। हिमाचल बॉक्स के हर प्रोडक्ट के पीछे एक कहानी है, एक चेहरा है, एक परिवार है।
आज ये सफ़र शुरुआती दौर में है, लेकिन दिशा बिल्कुल साफ़ है कि ये सिर्फ़ एक उद्यमी की कहानी नहीं, ये पूरे हिमाचल प्रदेश के हुनरमंद हाथों की सामूहिक यात्रा है। हिमालयन क्राफ्ट से हिमाचल बॉक्स तक का सफर ये सिर्फ़ किरण ठाकुर की नहीं पूरे हिमाचल प्रदेश के सपनों में रंग भरने की कहानी है।
आप भी चाहते हैं कि पहाड़ों की असली पहचान ज़िंदा रहे, तो इस सफ़र का हिस्सा बनिए।
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