सुई-धागे से सपनों तक: ‘ज़रिम’ ने पहाड़ों की बुनाई को दिया राष्ट्रीय पहचान
सुई-धागे से सपनों तक: ‘ज़रिम’ ने पहाड़ों की बुनाई को दिया राष्ट्रीय पहचान
विनोद भावुक। शिमला
औपचारिक शिक्षा न हो, संसाधन सीमित हों, फिर भी अगर संकल्प मज़बूत हो, तो कामयाबी रास्ता खुद बना लेती है। हिमाचल प्रदेश के दूरस्थ पहाड़ी गांव गोहरमा से निकली ज़रिम सेल्फ हेल्प ग्रुप की कहानी इसी विश्वास की मिसाल है। इस प्रेरक यात्रा की अगुवाई करती हैं मान दासी, जिन्होंने सुई-धागे और ऊन से आजीविका की वह बुनियाद रखी, जो आज राष्ट्रीय मंचों तक पहुंच चुकी है।
साल 2003–04 में, वॉटरशेड योजना के तहत मान दासी ने 10 महिलाओं के छोटे समूह के साथ पारंपरिक ऊन के मोज़े बुनने का काम शुरू किया। स्कूल न जाने के बावजूद उनकी समझ और नेतृत्व ने इस स्थानीय ज़रूरत को संरचित उद्यम में बदल दिया। स्थानीय प्रशासन के सहयोग से समूह को दिशा मिली और पहाड़ों की मेहनत बाजार तक पहुंचने लगी।
दो दशकों में ‘ज़रिम’ ने घाटी की सीमाएं तोड़ीं। दिल्ली, जयपुर, उदयपुर, शिमला और धर्मशाला जैसे शहरों की प्रदर्शनियों और मेलों में लाहौली ऊनी उत्पादों ने अपनी अलग पहचान बनाई। समय के साथ समूह ने सी-बकथॉर्न आधारित उत्पादों को भी जोड़ा स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों में मूल्यवर्धन का बेहतरीन उदाहरण। ‘ज़रिम’ की सबसे बड़ी ताक़त है पीढ़ियों का संगम। जहां बुज़ुर्ग महिलाएं आज भी पारंपरिक बुनाई से विरासत को सहेजती हैं, वहीं नई पीढ़ी मोबाइल फोन के ज़रिये ऑपरेशंस, ऑर्डर और सप्लाई संभाल रही है। परंपरा और तकनीक का यह मेल ‘ज़रिम’ को समय के साथ आगे बढ़ाता है।
मान दासी कहती हैं, हमने सुई और ऊन से शुरुआत की मान दासी कहती हैं, आज हमारी बुज़ुर्ग महिलाएं परंपराएं बुनती हैं और युवा पीढ़ी व्यवसाय संभालती है। 2003 से निरंतर संचालन, राष्ट्रीय पहुंच, और ऊनी व सी-बकथॉर्न उत्पाद—ये सब ‘ज़रिम’ की पहचान हैं।
यह कहानी केवल बुनाई की नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, सामूहिक शक्ति और पहाड़ी स्वाभिमान की है। ‘ज़रिम’ ने दिखा दिया कि जब हाथों में हुनर और दिल में विश्वास हो, तो पहाड़ों से भी राष्ट्रीय सपने बुने जा सकते हैं।
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