शिमला से शांतिनिकेतन तक : धर्म-दर्शन, शिक्षा, पत्रकारिता और राष्ट्रवाद के सेतु निर्माता ब्रह्मबंधव उपाध्याय
शिमला से शांतिनिकेतन तक : धर्म-दर्शन, शिक्षा, पत्रकारिता और राष्ट्रवाद के सेतु निर्माता ब्रह्मबंधव उपाध्याय
विनोद भावुक। शिमला
औपनिवेशिक भारत के वैचारिक मानचित्र में शिमला केवल सत्ता और प्रशासन का केंद्र नहीं रहा। शिमला से शिक्षा, पत्रकारिता और राष्ट्रवादी विचारों की अनुगूंज दूर-दूर तक पहुंची। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में ब्रह्मबंधव उपाध्याय (भवानी चरण बंद्योपाध्याय) का नाम विशेष महत्व रखता है। वे एक ऐसे चिंतक, पत्रकार और स्वतंत्रता-सेनानी थे, जिनकी गतिविधियों का शिमला से सीधा संबंध रहा। उनका जीवन भारतीय पुनर्जागरण व स्वाधीनता संघर्ष की वैचारिक धारा को ऊर्जा देता रहा।
ब्रह्मबंधव उपाध्याय का शिमला से जुड़ाव केवल औपचारिक नहीं था। वे 1887 में स्थापित बंगाली बॉयज़ हाई स्कूल (बाद में यूनियन एकेडमी) से जुड़े रहे। यह संस्थान शिमला में शिक्षा के प्रसार का एक महत्वपूर्ण प्रयास था, जिसकी अध्यक्षता उस समय सर नृपेन्द्रनाथ सरकार ने की थी। यहां उपाध्याय ने अध्यापन और बौद्धिक संवाद के माध्यम से आधुनिक शिक्षा को भारतीय परंपरा से जोड़ने की अपनी दृष्टि को व्यवहार में उतारा।
बहुआयामी व्यक्तित्व: धर्म, दर्शन और राष्ट्र
11 फरवरी 1861 को बंगाल के हुगली ज़िले में जन्मे ब्रह्मबंधव उपाध्याय ने जीवन में अनेक धार्मिक–दार्शनिक यात्राएं कीं। ब्राह्मण परंपरा, ब्रह्मो समाज, ईसाई धर्म (कैथोलिक) और अंततः भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता से उनका गहरा जुड़ाव रहा। वे स्वयं को ‘हिंदू कैथोलिक’ कहते थे। केसरिया वस्त्र, नंगे पांव चलना और गले में क्रॉस, उनकी जीवन शैली भी संस्कृति-संवाद का जीवंत प्रतीक थी।
उपाध्याय का शैक्षिक स्वप्न वेदांत और आधुनिक शिक्षा के मेल पर आधारित था। इसी दृष्टि ने उन्हें रवींद्रनाथ ठाकुर के निकट लाया। शांतिनिकेतन में प्रारंभिक शैक्षिक प्रयोगों में उनकी भूमिका रही, जिससे आगे चलकर विश्व भारती की नींव पड़ी। यह वैचारिक सेतु शिमला में हुए उनके शैक्षिक अनुभवों से भी पोषित था, जहां उन्होंने शिक्षा को राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का औज़ार माना।
पत्रकारिता और स्वाधीनता: ‘संध्या’ की गर्जना
1905 के बाद बंगाल विभाजन के दौर में उपाध्याय का राष्ट्रवादी स्वर तीव्र हुआ। वे ‘संध्या’ पत्रिका के संपादक बने, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद की तीखी आलोचना के लिए जानी जाती थी। उनके लेखों में स्वराज, आत्मबलिदान और राष्ट्रीय चेतना की पुकार थी। यही निर्भीकता उन्हें राजद्रोह के मुकदमे तक ले गई। 1907 में गिरफ़्तारी के दौरान उन्होंने अदालत में साफ कहा कि वे विदेशी शासन के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं।
27 अक्टूबर 1907 को, मात्र 46 वर्ष की आयु में, कोलकाता में उनका निधन हुआ। अंतिम यात्रा में हज़ारों लोग ‘वंदे मातरम्’ के उद्घोष के साथ शामिल हुए। यह जनसमर्थन उनके विचारों की गहराई का प्रमाण था। ब्रह्मबंधव उपाध्याय को धर्म-दर्शन, शिक्षा, पत्रकारिता और राष्ट्रवाद चारों क्षेत्रों में सेतु-निर्माता के रूप में याद किया जाता है।
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