शिमला से सुप्रीम कोर्ट तक: कानून की विरासत और कपिल सिब्बल की वकालत कहानी का शिमला कनेक्शन
शिमला से सुप्रीम कोर्ट तक: कानून की विरासत और कपिल सिब्बल की वकालत कहानी का शिमला कनेक्शन
विनोद भावुक। शिमला
शिमला सिर्फ़ पहाड़ों और अंग्रेज़ी इमारतों का शहर नहीं, बल्कि यह आधुनिक भारत की कानूनी और बौद्धिक विरासत का भी अहम केंद्र रहा है। इसी शिमला से जुड़ा है एक ऐसा नाम, जिसने भारतीय न्याय व्यवस्था में गहरी छाप छोड़ी हीरा लाल सिब्बल। पिता की इसी कानूनी विरासत से आगे बढ़ा रहे हैं देश के जाने-माने वकील और राजनेता कपिल सिब्बल।
लाहौर से शिमला का सफर
भारत की आज़ादी के बाद, 1948 में हीरा लाल सिब्बल लाहौर से शिमला आए। उस दौर में शिमला पंजाब की राजधानी था। शिमला न्याय, प्रशासन और नीति-निर्माण का केंद्र भी था। यहीं से सिब्बल परिवार की वह कानूनी यात्रा शुरू हुई, जिसने देश की अदालतों और संसद तक असर डाला। हीरा लाल सिब्बल ने शिमला रहते हुए कानून को पेशा और नैतिक साहस का माध्यम बनाया।
साहित्य बनाम सेंसरशिप
1945 में, जब उर्दू साहित्यकार सआदत हसन मंटो और इस्मत चुगताई पर अश्लील लेखन के आरोप लगे, तब हीरा लाल सिब्बल। उनका बचाव करने वाले वकील थे। यह मुकदमे सिर्फ़ कानून नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की आज़ादी की परीक्षा थे। मंटो अदालत से बरी हुए और इस्मत चुगताई पर मामूली जुर्माना लगा। इन मामलों ने सिब्बल को निडर वकील के रूप में स्थापित किया।
पिता की छाया, बेटे की उड़ान
इसी कानूनी माहौल में बड़े हुए कपिल सिब्बल। शिमला, फिर चंडीगढ़ और दिल्ली, हर जगह कानून पर चर्चा, बहस और तर्क उनके जीवन का हिस्सा बने। आज कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता, भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय मंत्री और संवैधानिक मामलों के प्रमुख चेहरा माने जाते हैं। देश के कई बहुचर्चित मामलों में उनकी वकालत का लोहा सारा देश मानता है।
बेटे की दलीलें, पिता की विरासत
हीरा लाल सिब्बल दो बार पंजाब और हरियाणा के एडवोकेट जनरल रहे, लेकिन उन्होंने जज बनने का प्रस्ताव ठुकरा दिया, क्योंकि वे अदालत में बहस को ही अपना असली मंच मानते थे। 2006 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। कहा जाता है कि कपिल सिबल की बेबाक दलीलों में पिता हीरा लाल सिब्बल की वैचारिक विरासत झलकती है।
इतिहास की सीख, जीवित विरासत
शिमला की पहाड़ियों से निकली यह प्रेरक कहानी बताती है कि कैसे एक शहर, एक परिवार और एक सोच, देश की न्याय व्यवस्था को दशकों तक दिशा दे सकती है। न्याय पालिका में अनूठी मिसाल कायम करने वाले सिब्बल परिवार की कहानी प्रेरक है। कानून को सत्ता नहीं, संविधान के साथ खड़ा करना सिब्बल परिवार की सबसे बड़ी विरासत है और यह विरासत आज भी जीवित है।
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/in-75-days-he-ran-1500-kilometers-and-crossed-40-mountain-passes-himachal-pradesh-witnessed-the-ultra-running-feat-of-peter-van-geit-from-belgium-40/
