‘फ्रॉम द बैंक्स ऑफ द ब्यास’ : कांगड़ा ‘रे’ गांव के राजपूत ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर हीरा सिंह के शौर्य के बहाने फौजी रिश्तों की अनोखी दास्तान सुनाती पुस्तक

‘फ्रॉम द बैंक्स ऑफ द ब्यास’ : कांगड़ा ‘रे’ गांव के राजपूत ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर हीरा सिंह के शौर्य के बहाने फौजी रिश्तों की अनोखी दास्तान सुनाती पुस्तक
‘फ्रॉम द बैंक्स ऑफ द ब्यास’ : कांगड़ा ‘रे’ गांव के राजपूत ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर हीरा सिंह के शौर्य के बहाने फौजी रिश्तों की अनोखी दास्तान सुनाती पुस्तक
विनोद भावुक। धर्मशाला
इतिहास युद्धों का ब्योरा भर नहीं, इंसानी जज़्बात, रिश्तों और कर्तव्य की कहानियों से बनता है। ऐसी ही एक दुर्लभ और प्रेरककथा को शब्दों में पिरोया है लेफ्टिनेंट जनरल जीएस कटोच ने अपनी पुस्तक ‘फ्रॉम द बैंक्स ऑफ द ब्यास’ (From the Banks of the Beas) में। वास्तविक घटनाओं और कल्पना का संतुलित संगम पाठकों को बीते दौर में ले जाता है।
‘फ्रॉम द बैंक्स ऑफ द ब्यास’ पुस्तक सौ साल पुराने संस्मरणों को जीवंत करती है। यह पाठकों को बताती है कि इतिहास केवल राजाओं और युद्धों की कहानी नहीं, बल्कि उन अनगिनत सैनिकों की भी गाथा है, जिन्होंने कर्तव्य और नैतिकता को सर्वोपरि रखा। पुस्तक सैन्य इतिहास प्रेमियों के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी अमूल्य धरोहर है।
ब्यास नदी जिसे यूनानी इतिहास में हाइफ़ेसिस कहा गया और जहां से विश्व विजेता कहे जाने वाले सिकंदर महान को 326 ईसा पूर्व घर वापसी करनी पड़ी थी। ‘फ़्रोम द बैंक्स ऑफ द ब्यास कहानी’ के नायक हीरा सिंह का जन्म 1871 में कांगड़ा जिला में ब्यास नदी के किनारे बसे ‘रे’ गांव के डोगरा राजपूत पठानिया कुल में हुआ।
फ्रांस से फिलिस्तीन तक शौर्यगाथा
हीरा सिंह के पिता की मृत्यु के बाद चाचाओं, मां और परिवार के अन्य सदस्यों ने हीरा सिंह में अनुशासन, शौर्य और नैतिक मूल्यों का बीज बोया। तीरंदाजी, घुड़सवारी और तैराकी में दक्ष हीरा सिंह ने ब्रिटिश भारतीय सेना की प्रसिद्ध कैवेलरी रेजीमेंट 19वीं लेंसर्स (फेन्स हॉर्स) में वायसराय कमीशंड अधिकारी के रूप में कमीशन लिया।
1914 में जब प्रथम विश्व युद्ध छिड़ा, भारतीय सैनिकों को यूरोप भेजा गया। यह एक ऐतिहासिक फैसला था, क्योंकि इससे पहले भारतीय सैनिकों को भारत से भाहर यूरोप में लड़ने नहीं भेजा जाता था। कराची से मार्सेई (फ्रांस) तक जहाज़ से पहुंचे भारतीय सैनिकों का फ्रांसीसियों स्वागत किया। रेजिमेंट ने फ्लैंडर्स की खाइयों से लेकर फिलिस्तीन की जॉर्डन घाटी तक बहादुरी दिखाई।
जम्मू-कश्मीर बल के लेफ्टिनेंट कर्नल
दमिश्क की ओर बढ़ते हुए घुड़सवार हमलों ने दुश्मनों को चौंका दिया। रेजिमेंट के रिसालदार मेजर के रूप में हीरा सिंह ने निष्पक्षता और साहस का परिचय दिया। उन्होंने अपने कमांडिंग ऑफिसर के सामने खड़े होकर जमेदार सरबलंद खान को उचित सम्मान देने की मांग की। क्योंकि उनके अनुसार सम्मान सही पात्र को मिलना चाहिए।
1923 में रिटायरमेंट के बाद भी हीरा सिंह का सैनिक जीवन समाप्त नहीं हुआ। एक संयोगवश मुलाकात ने उन्हें जम्मू-कश्मीर रियासत के सुरक्षा बलों में लेफ्टिनेंट कर्नल बना दिया। कर्नल के तौर पर जम्मू- कश्मीर रियासत में उन्होंने बॉडीगार्ड कैवेलरी के एकीकरण में अहम भूमिका निभाई। उनके साहस के किस्से रियासत में मशहूर हुए।
खून से भी गहरे सेना के रिश्ते
इस पुस्तक का सबसे प्रभावशाली पहलू है रेजिमेंटल स्पिरिट। कैसे विभिन्न धर्मों और जातियों मुस्लिम, सिख, डोगरा, पठान, के सैनिक एक परिवार की तरह रहे। कैसे एक विधवा की पेंशन के लिए वे बिना अपॉइंटमेंट जनरल से मिल सकते थे, सिर्फ इसलिए कि वे एक ही रेजिमेंट के साथी थे। लेखक का कहना है कि रेजिमेंटल बंधन वही समझ सकता है, जिसने फौज में रेजिमेंट के साथ सेवा की हो।
‘फ़्रोम द बैंक्स ऑफ द ब्यास’ में परिवार, परंपरा और कर्तव्य का अद्भुत समन्वय, औपनिवेशिक भारत और विश्वयुद्ध की दुर्लभ झलक मिलती है। पुस्तक महिलाओं, विधवाओं और सैनिक परिवारों की सामाजिक स्थिति पर प्रकाश डालती है। यह पुस्तक केवल सैन्य इतिहास नहीं, बल्कि उन मानवीय रिश्तों की दास्तान है, जिन्होंने राष्ट्र की नींव मजबूत की।
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Jyoti maurya

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