शिमला की पहाड़ियों से मंडी की घाटियों तक सरदार सर जोगेंद्र सिंह की प्रेरककथा, जिनकी सोच से रोशन हुई मंडी रियासत, देश को दिखाया आईआईटी का सपना
शिमला की पहाड़ियों से मंडी की घाटियों तक सरदार सर जोगेंद्र सिंह की प्रेरककथा, जिनकी सोच से रोशन हुई मंडी रियासत, देश को दिखाया आईआईटी का सपना
विनोद भावुक! शिमला/मंडी
आज की प्रेरक और रोचक कथा के नायक हैं सरदार सर जोगेंद्र सिंह। एक ऐसा व्यक्तित्व, जिन्होंने औपनिवेशिक भारत में रहते हुए भी आधुनिक भारत की बुनियाद रखी। सरदार सर जोगेंद्र सिंह (1877–1946) वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में पहुंचने वाले पहले सिख थे। वे शिक्षा, तकनीक और विकास को एक साथ देखने वाले विरले राजनेता भी थे। सर जोगेंद्र सिंह का शिमला से रिश्ता केवल प्रशासनिक नहीं, वैचारिक और पारिवारिक था।
शिमला स्थित सरदार सर जोगेंद्र सिंह का ऐतिहासिक निवास ऐरा होल्मे एस्टेट (Aira Holme Estate)आज भी उस दौर की याद दिलाता है, जब शिमला ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करता था। शिमला रहकर उन्होंने नीतियों पर काम किया, सिख समुदाय के संवैधानिक अधिकारों की पैरवी की और राष्ट्रीय स्तर पर संवाद की राजनीति को आगे बढ़ाया। शिमला उनके लिए सत्ता का केंद्र भर नहीं था, बल्कि विचारों की प्रयोगशाला था।
शानन की बिजली से रोशन की मंडी रियासत
सरदार सर जोगेंद्र सिंह की सोच का केंद्र बेशक शिमला था, पर मंडी उनकी ज़मीनी प्रयोगशाला थी। उनके कार्यकाल में ही मंडी हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट का काम पूरा हुआ और मंडी रियासत दूधिया रोशनी से जगमगा उठी। मंडी हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट आज का शानन पावर हाउस के नाम से जाना जाता है। शानन पावर हाउस हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक इतिहास का मील का पत्थर साबित हुआ।
इसी परियोजना के आस- पास बसाया गया नगर जोगिंद्रनगर, आज भी उनके नाम की जीवित पहचान है। हालांकि यह भी कहा जाता है कि जोगिंद्रनगर की स्थापना मंडी रियासत के राजा जोगेन्द्र सेन ने की थी। सर जोगेंद्र सिंह के प्रयास से पहाड़ों में बिजली, उद्योग और आधुनिक बुनियादी ढांचे की जो शुरुआत हुई, उसने मंडी रियासत को ऊर्जा मानचित्र पर स्थापित कर दिया। यह परियोजना संदेश था कि पहाड़ भी आधुनिकता के वाहक बन सकते हैं।
राजनीति में सिद्धांत और साहस
सरदार सर जोगेंद्र सिंह 1911 में पटियाला रियासत के गृह मंत्री बने। वे 1926 में पहली बार पंजाब लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य चुने गए। वे पंजाब लेजिस्लेटिव काउंसिल के लिए लगातार तीन कार्यकाल के लिए चुने गए। साल 1936 में सरदार सर जोगेंद्र सिंह ने खालसा नेशनल पार्टी की स्थापना की और 1937 के चुनावों में उनकी पार्टी ने शानदार जीत की।
साल 1942 में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में प्रवेश करने वाले सरदार सर जोगेंद्र सिंह पहले सिख सदस्य बने। इसी दौर में वे क्रिप्स मिशन (1942) के लिए चुने गए सिख प्रतिनिधियों में भी शामिल किए गए। यह वह समय था, जब भारत के भविष्य पर ऐतिहासिक मंथन चल रहा था। उन्होंने भारत के सुनहरे भविष्य के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य से संबन्धित नीतियों के निर्माण में खास भूमिका निभाई।
आईआईटी का सपना, आज़ादी से पहले भविष्य की तैयारी
1946 में सर जोगेंद्र सिंह की पहल पर बनी 22 सदस्यीय ‘सरकार समिति’, (अध्यक्ष: नलिनी रंजन सरकार) ने भारत में उच्च तकनीकी संस्थानों की सिफ़ारिश की। यही सिफ़ारिश आगे चलकर आईआईटी खड़गपुर और फिर पूरे आईआईटी नेटवर्क का आधार बनी। आज आईआईटी भारत की वैश्विक पहचान हैं और तकनीकी शिक्षा ही आत्मनिर्भर भारत की कुंजी है। तकनीकी शिक्षा के विकास की कहानी में सर जोगेंद्र सिंह की दूरदृष्टि मौजूद है।
महात्मा गांधी ने लिखी पुस्तक की भूमिका
सर जोगेंद्र सिंह एक सक्रिय लेखक और विद्वान भी थे। उनकी रचनाओं में ‘Thus Spake Guru Nanak’, ‘Sikh Ceremonies’,’Life of B.M. Malabari’ और The ‘Persian Mystics’ (सूफी संत अब्दुल्ला अंसारी के काव्य का अनुवाद) प्रमुख हैं। उनके बौद्धिक कद का प्रमाण यही है कि उनकी पुस्तक ‘The Persian Mystics’ की भूमिका महात्मा गांधी ने लिखी है। वे सिख दर्शन, सूफी विचार और आधुनिक मानवतावाद के बीच संवाद के पुल थे।
आधुनिक भारत की बुनियाद के बड़े स्तंभ
3 दिसंबर 1946 को सर जोगेंद्र सिंह का निधन हुआ। वे एक प्रबुद्ध परिवार, शिमला का एआईआरए होल्मे, मंडी का रोशन भविष्य और भारत की तकनीकी आत्मा का बीज अपने पीछे छोड़ गए। सरदार सर जोगेंद्र सिंह उन नेताओं में थे, जिन्होंने शिमला में नीति गढ़ी, मंडी में विकास जमीन पर उतारा और पूरे भारत के लिए भविष्य की शिक्षा की दिशा तय की। वे इतिहास के हाशिये पर नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की बुनियाद में खड़े स्तंभ हैं।
