शहर की भागदौड़ से पहाड़ों की शांति तक: ‘एरोमैटिक हिमालयाज़’ की खुशबू में बसी सुकून की कहानी
शहर की भागदौड़ से पहाड़ों की शांति तक: ‘एरोमैटिक हिमालयाज़’ की खुशबू में बसी सुकून की कहानी
विनोद भावुक। शिमला
आधुनिक जीवन की तेज़ रफ्तार में लोग अक्सर अपने भीतर की शांति खो बैठते हैं। ऐसे समय में हिमालय की गोद से निकली एक पहल ने लोगों को फिर से खुद से जुड़ने का रास्ता दिखाया है। यह कहानी है रीना ठाकुर की, जिन्होंने ‘एरोमैटिक हिमालयाज़’ के ज़रिये सुकून को उत्पाद नहीं, बल्कि अनुभव बना दिया।
हिमाचल प्रदेश की शुद्ध हवा और पहाड़ों की शांति में पली-बढ़ी रीना ठाकुर का विश्वास हमेशा से प्रकृति की उपचारक शक्ति में रहा। लेकिन करियर की तलाश उन्हें शहर ले गई, जहां डेडलाइंस, तनाव और तेज़ जीवनशैली ने पहाड़ों की शांति को एक दूर की याद बना दिया।
कोविड महामारी वह ठहराव लेकर आई, जिसने दुनिया को रुककर सोचने का मौका दिया। इसी दौरान रीना ने अपनी जड़ों की ओर लौटने का फैसला किया। उन्होंने ज़मीन से जुड़ाव फिर महसूस किया और CSIR–मिशन एरोमा के तहत औषधीय पौधे उगाने वाले किसानों और महिला उत्पादकों से मुलाकात की। यहीं से एक नई सोच ने जन्म लिया।
रीना को एहसास हुआ कि ये खेत सिर्फ़ फसल नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली और टिकाऊ आजीविका की उम्मीद हैं। तभी उन्होंने तय किया कि हिमालय की शांति को शहरों के घर-घर तक पहुंचाया जाएगा, ऐसे उत्पादों के ज़रिये, जो कोमल, शुद्ध और प्राकृतिक हों।
यहीं से ‘एरोमैटिक हिमालयाज़’ का जन्म हुआ। यह ब्रांड सिर्फ़ खुशबूदार उत्पाद नहीं बनाता, बल्कि हीलिंग एक्सपीरियंस रचता है, जो लोगों को आधुनिक जीवन के शोर में भी खुद से जुड़ने में मदद करता है। स्थानीय उत्पादकों को समर्थन, प्राकृतिक फ़ॉर्म्युलेशन और सौम्य अनुभव, यही इसकी पहचान है। रीना ठाकुर कहती हैं, दुनिया को सिर्फ़ उत्पादों की नहीं, उपचार की ज़रूरत है, कोमल, शुद्ध और सच्चे अनुभवों की।
एरोमैटिक हिमालयाज़ की कहानी बताती है कि जब व्यवसाय का उद्देश्य लाभ से आगे बढ़कर मानसिक शांति, सामुदायिक सहयोग और प्रकृति से जुड़ाव बन जाए, तो उसका असर गहरा और स्थायी होता है।
यह सिर्फ़ एक ब्रांड की कहानी नहीं, यह हिमालय की खुशबू में लिपटी एक सुकून भरी वापसी की कहानी है।
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