प्रेम की देवी’ : चंबा की राजकुमारी माता सुशील कौर, भारतीय इतिहास की वीर नायिका
प्रेम की देवी’ : चंबा की राजकुमारी माता सुशील कौर, भारतीय इतिहास की वीर नायिका
विनोद भावुक। चंबा
चंबा रियासत की राजकुमारी सुशील कौर को इतिहास माता सुशील कौर के नाम से जानता है। सुशील कौर भारतीय इतिहास की उन वीर नारियों में शामिल हैं, जिनका जीवन साहस, श्रद्धा और बलिदान का अनुपम उदाहरण है। हरीश ढिल्लों की पुस्तक ‘द लीजेंड ऑफ बंदा बहादुर’ में लिखते हैं कि सिख योद्धा बंदा सिंह बहादुर की पत्नी सुशील कौर सिख राज्य की स्थापना से जुड़ी उस गाथा की मूक साक्षी थीं, जिसने मुग़ल साम्राज्य की नींव हिला दी।
चंबा के महाराजा उदय सिंह की इकलौती पुत्री के रूप में जन्मीं सुशील कौर का पालन-पोषण राजसी वैभव के साथ हुआ और उन्हें शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा दी गई। तलवारबाज़ी, घुड़सवारी और कला शिल्प में दक्ष सुशील कौर चंबा रूमाल जैसी प्रसिद्ध कढ़ाई कला में भी निपुण थीं। इतिहासकार मैक्स आर्थर मैकॉलिफ़ ने उनके सौंदर्य और गरिमा का वर्णन ‘प्रेम की देवी’ के रूप में किया है।
हमलों का सामना किया, आत्मसमर्पण नहीं किया
1711 में चंबा में उनका विवाह सिख सेनानायक बंदा सिंह बहादुर से हुआ। विवाह के बाद उन्होंने एक सहजधारी जीवन अपनाया। 1712 में उनके पुत्र अजय सिंह का जन्म हुआ। जब बंदा सिंह बहादुर ने मुग़लों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ा, तब सुशील कौर अपने शिशु पुत्र के साथ उनके साथ रहीं। गुरदास नंगल के क़िले में आठ महीने तक चली घेराबंदी के दौरान उन्होंने भुखमरी, बीमारी और हमलों का सामना किया, परंतु आत्मसमर्पण नहीं किया।
दिसंबर 1715 में क़िला गिरने पर मुग़ल सेना बंदा सिंह, सुशील कौर और उनके पुत्र को बंदी बनाकर दिल्ली ले गई। बंदा सिंह बहादुर को लोहे के पिंजरे में सार्वजनिक रूप से घुमाया गया। सुशील कौर को उनके पति और पुत्र से अलग कर कारावास में रखा गया। 9 जून 1716 को उनके चार वर्षीय पुत्र अजय सिंह की हत्या उनके पिता के सामने कर दी गई। इसके बाद बंदा सिंह बहादुर को अमानवीय यातनाओं के बाद शहीद कर दिया गया।
सिख इतिहास में बलिदान और संकल्प की प्रतीक
इतिहासकारों में इस बात को लेकर मतभेद हैं कि सुशील कौर का अंत कैसे हुआ। कुछ स्रोतों में जबरन धर्मांतरण का उल्लेख है, जबकि सिख और राजपूत परंपराएं मानती हैं कि सम्मान की रक्षा के लिए उन्होंने 20 जून 1716 को कारावास में अपने प्राण त्याग दिए। इतिहासकार इसे राजपूत–क्षत्रिय परंपरा के जौहर जैसी आत्मबलिदान की भावना से जोड़ते हैं।
माता सुशील कौर का जीवन गवाही देता है कि भारतीय इतिहास में महिलाएं निर्णायक संघर्षों की सशक्त भागीदार थीं। माता सुशील कौर साहस, श्रद्धा और आत्मसम्मान की वह ज्योति हैं, जो आज भी नई पीढ़ी को प्रेरणा देती है। कहानी प्रासंगिक है, क्योंकि यह महिला साहस और नेतृत्व का ऐतिहासिक उदाहरण है। यह चंबा रियासत की गौरवशाली विरासत है और सिख इतिहास में बलिदान और संकल्प की प्रतीक है।
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