लाहौर की हवेली नौ निहाल सिंह, जिसकी दीवारों पर सजी हैं कांगड़ा पेंटिंग्स
लाहौर की हवेली नौ निहाल सिंह, जिसकी दीवारों पर सजी हैं कांगड़ा पेंटिंग्स
विनोद भावुक। धर्मशाला
लाहौर के पुराने शहर की गलियों में, ऊँची दीवारों और नक्काशीदार झरोखों के बीच एक हवेली है, जिसका नाम है ‘हवेली नौ निहाल सिंह’। बाहर से देखें तो यह एक साधारण सी ऐतिहासिक इमारत लगती है, पर भीतर कदम रखते ही लगता है, जैसे समय ठहर गया हो और दीवारों ने रंगों में इतिहास को कैद कर रखा हो।
इस हवेली की सबसे अनमोल धरोहर हैं कांगड़ा पहाड़ी शैली में बने भित्तिचित्र। सूक्ष्म ब्रश स्ट्रोक्स, कोमल रंगों और भावपूर्ण चेहरों के साथ यह कला 19वीं सदी के उत्तर भारत की सांस्कृतिक एकता की गवाही देती है। इन चित्रों में एक विशेष दृश्य है श्रीकृष्ण और गोपियों का रास, जो भक्ति, प्रेम और सौंदर्य का अद्भुत संगम है।
स्वप्न अधूरा, हवेली अमर
इस हवेली का निर्माण महाराजा रणजीत सिंह ने अपने पोते नौ निहाल सिंह के लिए करवाया था। युवा नौ निहाल सिंह शूरवीर और बुद्धिमान माने जाते थे, पर किस्मत ने उन्हें ज़्यादा वक़्त नहीं दिया और 1840 में एक रहस्यमयी दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई।
उनके चले जाने के बाद भी हवेली उनके नाम से अमर हो गई। समय ने करवट ली। 1849 में अंग्रेजों ने पंजाब पर कब्ज़ा किया और यह भव्य हवेली बदल गई एक लड़कियों के स्कूल विक्टोरिया गर्ल्स हायर सेकेन्डरी स्कूल में। जहाँ कभी राजकुमार टहला करते थे, वहाँ बेटियाँ पढ़ने लगीं।
साझा सांस्कृतिक विरासत की सबसे सुंदर मिसाल
आज भी इस स्कूल की दीवारों पर वही भित्तिचित्र जीवित हैं। कृष्ण के रास, ग्वालों की मुस्कान, और गोकुल की गलियाँ। कितनी अद्भुत बात है कि जहाँ कभी राजकुमारों की हँसी गूँजती थी, अब वहाँ ज्ञान की रोशनी और कला की प्रेरणा गूँजती है।
हो सकता है वहाँ पढ़ने वाली हर लड़की को यह न पता हो कि जिन दीवारों के साए में वे अक्षर सीखती हैं, वह पड़ोसी भारत के पंजाब और हिमाचल प्रदेश प्रांत की साझा सांस्कृतिक विरासत की सबसे सुंदर मिसाल हैं।
सीमाएँ भूल गया कला का संगम
कांगड़ा कला अपने सौम्य रंगों, भावनात्मक अभिव्यक्ति और प्रकृति के कोमल चित्रण के लिए जानी जाती है। और यह देखकर हैरानी होती है कि हिमालय की गोद में जन्मी यह कला, लाहौर की दीवारों तक पहुँची और वहाँ अपनी छाप छोड़ गई। यह सिर्फ़ कला नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का प्रवाह है, जो न धर्म जानता है, न सरहद।
इन चित्रों में कृष्ण सिर्फ़ गोपियों के साथ रास नहीं रचते, बल्कि रंगों के माध्यम से सभ्यता, संस्कृति और प्रेम का शाश्वत नृत्य करते हैं। कला जो जोड़ती है सीमाओं से परे, समय से परे। यह हवेली सिर्फ़ ईंटों और दीवारों का ढांचा नहीं यह साझा विरासत की जीवित कहानी है, जहाँ हर रंग, हर आकृति कुछ कहती है। कला कभी नहीं मरती, वह बस नए रूप में जीती रहती है।
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