‘हिप्पीलैंड’ : चरस की गंध से भरी हवा और पहाड़ियों पर धूप सेंकते अधनंगे विदेशी, मशहूर हुई थी जर्मन युवती और खीरगंगा के साधु की प्रेम कहानी

‘हिप्पीलैंड’ : चरस की गंध से भरी हवा और पहाड़ियों पर धूप सेंकते अधनंगे विदेशी, मशहूर हुई थी जर्मन युवती और खीरगंगा के साधु की प्रेम कहानी
‘हिप्पीलैंड’ : चरस की गंध से भरी हवा और पहाड़ियों पर धूप सेंकते अधनंगे विदेशी, मशहूर हुई थी जर्मन युवती और खीरगंगा के साधु की प्रेम कहानी
विनोद भावुक। मनाली
मनाली आज भले ही पर्यटकों का स्वर्ग कहलाता है, लेकिन 1960-70 के दशक में यह ‘हिप्पी युग’ का केंद्र बन गया था। पश्चिमी देशों से आए ये लोग जीवन की भागदौड़ छोड़कर पहाड़ों की गोद में शांति और ‘नशे में लिपटी आज़ादी’ की तलाश में पहुंचते थे। तब अख़बारों में लेख छपते थे, मनाली अब ‘हिप्पीलैंड’ बन गया है।
यहां की हवा चरस की गंध से भरी है और पहाड़ियों पर आधे कपड़ों में विदेशी सूरज सेंकते दिखते हैं। हिप्पी आंदोलन का जन्म 1960 के दशक में पश्चिम में हुआ। भारत में इसके केंद्र बने गोवा, ऋषिकेश और मनाली। मनाली की पार्वती घाटी खासकर खीरगंगा, मणिकरण, तोष और मलाणा पश्चिमी देशों से आने वाले यात्रियों का आश्रय स्थल बन गए थे।
जर्मन युवती और खीरगंगा के साधु
ऐसा कहा जाता है, हिप्पियों ने मनाली की युवा पीढ़ी को बीडी और भांग के नशे की तरफ़ धकेला। गाँवों के कुछ युवाओं को चरस के ‘स्मगलिंग’ तक सिखाई। कई विदेशी महिलाओं ने भारतीय साधुओं से विवाह भी किए। एक ऐसी ही कहानी एक जर्मन युवती और खीरगंगा के साधु की थी, जो प्रेम और “धर्म दोनों की सीमाएं मिटा देने वाली थी।
आज भी फेवरिट डेस्टिनेशन
मनाली और कुल्लू-परवती घाटी आज भी विदेशी यात्रियों के प्रिय ठिकाने हैं। कैफे संस्कृति, रंग-बिरंगे ट्रांस फेस्टिवल और हर्बल दुकानों में अब भी उस दौर की गूंज सुनाई देती है। यह वही जगह है जहां हिप्पियों ने पहाड़ों में शांति खोजी थी और मनाली ने उन्हें एक नया ठिकाना दे दिया था।
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Jyoti maurya

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