इतिहास बोलता है : लाहौल के बर्फीले रेगिस्तान की तस्वीर, यूरोप से आए मिशनरियों ने बदली तकदीर
इतिहास बोलता है : लाहौल के बर्फीले रेगिस्तान की तस्वीर, यूरोप से आए मिशनरियों ने बदली तकदीर
विनोद भावुक/ हिमाचल बिजनेस
ब्रिटिश भारत में 172 साल पहले साल 1853 में यूरोप के मोरावियन मिशनरी लाहौल के कारदंग गाँव पहुँचे थे। ए. डब्ल्यू. हायडे और उनकी पत्नी लाहौल घाटी के पहले मिशनरी थे। मिशनरियों का असली उद्देश्य यहां के कबायलियों को ईसाई बनाना था, इसके लिए उन्होंने बर्फीले रेगिस्तान में खूब कसरत की।
मजबूत बौद्ध परंपराओं और लामाओं के प्रभाव के कारण 87 साल के लगातार जमीनी प्रयासों के बावजूद मिशनरी धर्मांतरण में नाकाम रहे। साल 1940 तक मिशनरियों को घाटी छोड़नी पड़ी, इस घाटी को शिक्षा, खेती और आधुनिकता की ओर बढ़ाने के उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
1861 में केलंग में खुला प्राइमरी स्कूल
सबसे पहले मोरावियन मिशनरी कारदंग गाँव पहुँचे और अगले ही वर्ष 1854 में उन्होंने केलंग में अपना दफ्तर बना लिया। दरअसल, कारदंग में सूरज जल्दी डूब जाता था, जबकि केलंग में धूप ज़्यादा देर तक रहती थी। 1861 में केलंग में प्राइमरी स्कूल और पट्टन घाटी के ठोलंग में उसकी शाखा खोली गई।
मिशनरियों ने लाहौल में केवल शिक्षा ही नहीं, खेती और बागवानी में भी नया अध्याय लिखा। साल 1857 में लाहौल में पहली बार आलू और गोभी उगाई गई। उसके बाद सेब, खुमानी और नाशपाती की बागवानी के भी प्रयोग किए गए। नाशपाती को छोड़कर बाकी फलों की खेती सफल रही।
केलंग में खोला प्रिंटिंग प्रेस
मिशनरियों ने केलंग में प्रिंटिंग प्रेस भी खोला, जहां 1904 की जनगणना के कुछ फॉर्म छापे गए थे। ईसाई धर्म के भजनों और धार्मिक ग्रंथों का अनुवाद लाहौली और तिब्बती भाषा में किया। महिलाओं को ऊन से दस्ताने, मोज़े और स्वेटर बुनना सिखाया, उनके हुनर से बने उत्पाद बाज़ार में बिकने लगे। आलू और सेब की खेती ने गाँवों की अर्थव्यवस्था बदल दी।
लाहौल की शिक्षा, कृषि और सामाजिक जीवन में मिशनरियों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मिशनरियों की कहानी सिर्फ पहाड़ों, बर्फ़ और मठों तक सीमित नहीं है। उन्होंने ही इस घाटी को शिक्षा, खेती और आधुनिकता की ओर बढ़ाया।
‘मोरावियन मिशनरियों का योगदान’
हिमाचल प्रदेश कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी से डॉ. तुलसी रमन के संपादन में प्रकाशित पुस्तक ‘अनफोल्डिंग द मिस्टिकल लाहौल—स्पीति’ में लेखक बलराम के एक आलेख ‘मोरावियन मिशनरियों का योगदान’ में लाहौल की उस ऐतिहासिक यात्रा को याद किया गया है, जब यूरोप से आए मिशनरियों ने इस बर्फीली घाटी की तकदीर बदलने का प्रयास किया।
इस आलेख में घाटी की दशा और दिशा बदलने के मिशनरियों की भूमिका की पड़ताल की गई है। मिशनरियों ने 1861 में घाटी में औपचारिक शिक्षा शुरू कर दी थी, जबकि सरकारी स्तर पर लाहौल में पहला स्कूल 58 साल बाद 1919 में शुरू हुआ था।
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