आलू से कैसे बने सोना : उम्मीद से कम पैदावार, फूड प्रोसेसिंग की दरकार
आलू से कैसे बने सोना : उम्मीद से कम पैदावार, फूड प्रोसेसिंग की दरकार
हिमाचल बिजनेस। शिमला
केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान शिमला की रिपोर्ट के अनुसार देश में आलू की पैदावार उम्मीद से काफी कम रही है। केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई) शिमला की एक रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि देश में आलू उत्पादन में गिरावट देखने को मिल रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है खेती में लागत बढ़ना, जलवायु परिवर्तन और बाजार में उचित दाम न मिल पाना।
भारत दुनिया में आलू उत्पादन के मामले में तीसरे स्थान पर है, लेकिन गुणवत्ता और प्रसंस्करण के मामले में हम अभी भी पीछे हैं। किसान कड़ी मेहनत से आलू उगाते हैं, लेकिन उपज के बाद उसके भंडारण और प्रोसेसिंग की सुविधाओं का अभाव उन्हें भारी नुकसान पहुंचाता है।
उत्पादन में पिछड़ते किसान
भारत में आलू का औसत उत्पादन 19.9 टन प्रति हेक्टेयर है, जबकि अमेरिका में यह 48 टन और जर्मनी में 41 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच जाता है। तकनीकी और आधुनिक तरीकों की कमी के कारण भारतीय किसान वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं।
अधिकांश किसान अपनी आलू की फसल बेचने के लिए मंडियों पर निर्भर रहते हैं। भंडारण की कमी के कारण उन्हें मजबूरी में सस्ते दामों पर आलू बेचना पड़ता है। यही वजह है कि आलू से चिप्स, फ्रेंच फ्राइज और अन्य उत्पाद बनाने वाली प्रोसेसिंग इंडस्ट्री का विस्तार बेहद जरूरी हो गया है।
प्रोसेसिंग इंडस्ट्री का अभाव
देश में आलू की पैदावार का सिर्फ 7% हिस्सा ही प्रोसेसिंग इंडस्ट्री तक पहुंचता है। आलू चिप्स, आलू पापड़, फ्रेंच फ्राइज और स्टार्च इंडस्ट्री के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराने में भारत अभी भी बहुत पीछे है। यदि सरकार और निजी क्षेत्र इस दिशा में निवेश करें, तो किसानों को उचित मूल्य मिल सकता है और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार आलू किसानों के लिए भंडारण, कोल्ड चेन और फूड प्रोसेसिंग सुविधाओं का विस्तार करे।
तभी किसानों की मेहनत रंग लाएगी और भारत आलू उत्पादन के साथ-साथ आलू प्रोसेसिंग में भी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना सकेगा।
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