दिल में जुनून हो तो आत्मा की दृष्टि दिखा देती है मंजिल का पता, किन्नौर की दृष्टिहीन चोनज़िन अंगमो का अंधेरे से एवरेस्ट जीतने तक प्रेरक अभियान

दिल में जुनून हो तो आत्मा की दृष्टि दिखा देती है मंजिल का पता, किन्नौर की दृष्टिहीन चोनज़िन अंगमो का अंधेरे से एवरेस्ट जीतने तक प्रेरक अभियान
दिल में जुनून हो तो आत्मा की दृष्टि दिखा देती है मंजिल का पता, किन्नौर की दृष्टिहीन चोनज़िन अंगमो का अंधेरे से एवरेस्ट जीतने तक प्रेरक अभियान
विनोद भावुक/ शिमला
‘मैं कुछ देख नहीं सकती, लेकिन मुझे महसूस हुआ कि मैं दुनिया की सबसे ऊँची चोटी पर खड़ी हूं।‘
किन्नौर ज़िले के सुदूरवर्ती गांव चांगो की चोनज़िन अंगमो दृष्टिहीन होते हुए भी माउंट एवरेस्ट (8,849 मीटर) पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला और दुनिया की पांचवीं दृष्टिहीन पर्वतारोही बन गईं। अंगमो की आँखों की रोशनी क्या गई, उसने सपने देखने शुरू कर दिये और उन सपनों में रंग भरने के लिए जम कर पसीना बहाने लगी।
दृष्टिहीन होते हुए भी अंगमो ने बीड़ बिलिंग में पैराग्लाइडिंग, सियाचिन ग्लेशियर पर ट्रैकिंग, मनाली से खारदुंगला तक साइकलिंग और जूडो जैसे साहसी अभियानों में भाग लिया। यहीं से माउंट एवरेस्ट जीतने की धुन सवार हुई और एक दिन दुनिया की सबसे ऊंची चोटी को अपने कदमों तले झुका दिया। साबित हो गया कि जब दिल में जुनून हो, तो आंखों की रोशनी नहीं, आत्मा की दृष्टि ही मंज़िल दिखा देती है।
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने किया स्पोंसर
चोनज़िन अंगमो के लिए एवरेस्ट फतह करना कोई आसान काम नहीं था। भारत में एवरेस्ट अभियान पर जाने के लिए करीब 50 लाख रुपये खर्च आता है। इस अभियान का सारा खर्च यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने उठाया। चोनज़िन अंगमो इस बैंक की इंप्लोई हैं और बैंक ने इस अभियान को स्पोंसर किया।
चोनज़िन अंगमो ने पूर्व सैनिक रोमिल बार्थवाल के नेतृत्व में दो अनुभवी शेर्पा गाइड्स डुंडु शेर्पा और गुरूंग मैला की मदद से यह अद्भुत सफर तय किया कर अनूठा इतिहास रच दिया। अभियान दल 6 अप्रैल 2025 को दिल्ली से रवाना हुआ और 18 अप्रैल को बेस कैंप पर पहुंचा। इस दल ने 15 से 18 मई तक खतरनाक चढ़ाई चढ़ी और 19 मई को सुबह 8:30 बजे एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचा।
महाबोधि स्कूल और मिरांडा हाउस कॉलेज की स्टूडेंट
बचपन में की चोनज़िन अंगमो की दृष्टि सामान्य थी, लेकिन आठ साल की उम्र में अचानक उनकी नजर कमजोर होने लगी। डॉक्टरों के कई प्रयास किए, लेकिन असफल रहे और कुछ ही दिनों में वह पूर्णतः दृष्टिहीन हो गईं। आंखों की रोशनी खो देने के बाद भी पहाड़ों के बीच एक शांत गांव में रहने वाली यह किशोरी चुप नहीं बैठी रही।
परिजनों ने लेह के दृष्टिहीनों के लिए बने महाबोधि स्कूल में उसका दाखिल करवाया। इस स्कूल मेन ब्रेल लिपि को सीख कर पढ़ाई की। स्कूल की पढ़ाई पूरी कर अंगमो ने दिल्ली के प्रतिष्ठित मिरांडा हाउस कॉलेज में दाखिला लिया।
अभियान का सबसे डरावना पल
ग्लेशियर के ऊपर लोहे की सीढ़ियां चोनज़िन के लिए अभियान का सबसे मुश्किल हिस्सा था। इस अभियान में चोनज़िन ने ट्रेकिंग पोल और अन्य पर्वतारोहियों की हरकतों की ध्वनि से रूट की दिशा पहचानी। चोनज़िन अंगमो याद करती हैं, ‘मैं चल नहीं पाई, तो बैठकर हाथों से रेंगते हुए सफर जारी रखा। एवरेस्ट को नज़रों से नहीं, आत्मा से देखा। मैंने उसे देखा नहीं, पर महसूस किया। तेज़ हवा, ठंड, आंसू और एक गर्व से भरा हुआ क्षण जिया।‘
एवरेस्ट पर खड़ी होकर चोनज़िन ने उन सभी को याद किया, जिन्हें कभी कहा गया कि ‘तुमसे नहीं होगा।‘ वे कहती हैं, ‘एवरेस्ट अंत नहीं, शुरुआत है और सपना है सातों महाद्वीप की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करना।‘ वर्तमान में चोनज़िन दिल्ली में अकेली रहती हैं, मेट्रो से यात्रा करती हैं, खाना बनाती हैं और ऑफिस जाती हैं।
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Jyoti maurya

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