अनपढ़ सुनहरो देवी ने सिरमौर में क्रांति की शमां जलाई, पति के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी आजादी की लड़ाई

अनपढ़ सुनहरो देवी ने सिरमौर में क्रांति की शमां जलाई, पति के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी आजादी की लड़ाई
अनपढ़ सुनहरो देवी ने सिरमौर में क्रांति की शमां जलाई, पति के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी आजादी की लड़ाई
विनोद भावुक। धर्मशाला
देश की आज़ादी की लड़ाई में नारी शक्ति की कई मिसालें इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। ऐसी ही एक अद्भुत, साहसी और त्यागमयी महिला थीं सुनहरो देवी। सिरमौर के कुल्थ गाँव की सुनहरो देवी पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन उनके भीतर न्याय और समानता की प्रबल भावना थी। उनका विवाह पझौता आंदोलन के प्रमुख नेता स्वतंत्रता सेनानी और आयुर्वेदाचार्य वैद्य सूरत सिंह के साथ हुआ था।
1938 में सिरमौर रियासत में प्रजामंडल की गतिविधियाँ तेज़ हुईं। पझौता आंदोलन ने राजशाही के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद की। वैद्य सूरत सिंह और अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। सुनहरो देवी भी अपने ढाई साल के बेटे को घर छोड़कर गिरफ्तारी देने चल पड़ीं। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार नहीं किया
लेकिन वे अकेली, भूखी-प्यासी 25 मील पैदल चलकर अपने गांव लौटीं।
सेना ने बारूद से उड़ा दिया घर
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ आर्ट एंड एजूकेशन रिसर्च में छपे एचपीयू के सहायक प्रोफेसर डॉ विनय कुमार के रिसर्च पेपर के मुताबिक वैद्य सूरत सिंह की जेल से रिहाई के बाद दंपति ने आंदोलन को फिर संभाला। एक दुर्घटना में उनके पुत्र की मृत्यु हो गई, सुनहरो देवी ने संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ा। जब सेना ने उनके घर को बारूद से उड़ा दिया, तब भी वे अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटे।
1943 में सूरत सिंह को फिर कारावास की सज़ा हुई। तब सुनहरो देवी ने अकेले पूरे परिवार को संभाला और साथ ही जनता को जागृत करती रहीं। वे घर-घर जाकर लोगों को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रेरित करती थीं। 26 सितंबर 1958 को सुनहरी देवी इस संसार को छोड़ गईं। उनकी मृत्यु पर वैद्य सूरत सिंह ने जो श्रद्धांजलि लिखी, वह हृदय को झकझोर देती है।
इसलिए जरूरी है सुनहरो देवी की चर्चा
सुनहरो देवी ने मातृत्व से बड़ा राष्ट्रधर्म चुना, अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई, पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया और बेटे की मृत्यु और घर के विनाश के बाद भी हिम्मत नहीं हारी याद रखना जरूरी है कि इस स्वतंत्रता की नींव में सुनहरो देवी जैसी अनगिनत महिलाओं के आँसू, त्याग और साहस शामिल हैं।
सुनहरो देवी की कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा साहस वही है, जो कठिन से कठिन समय में भी टूटता नहीं। सुनहरो देवी इतिहास की किताबों में भले कम दिखती हों, लेकिन सिरमौर की धरती पर उनका नाम नारी शक्ति और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक है। पति के कंधे से कंधा मिलाकर देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाली इस नायिका को शत- शत नमन।
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Jyoti maurya

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