भारत की पहली महिला उर्दू संपादक ने शिमला की गोद में ली अंतिम सांस, मुस्लिम समाज में स्त्री शिक्षा की सबसे बुलंद आवाज़ थीं 30 से अधिक किताबों की लेखिका सैय्यदा मोहम्मदी बेगम

भारत की पहली महिला उर्दू संपादक ने शिमला की गोद में ली अंतिम सांस, मुस्लिम समाज में स्त्री शिक्षा की सबसे बुलंद आवाज़ थीं 30 से अधिक किताबों की लेखिका सैय्यदा मोहम्मदी बेगम
भारत की पहली महिला उर्दू संपादक ने शिमला की गोद में ली अंतिम सांस, मुस्लिम समाज में स्त्री शिक्षा की सबसे बुलंद आवाज़ थीं 30 से अधिक किताबों की लेखिका सैय्यदा मोहम्मदी बेगम
विनोद भावुक। शिमला
ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला, जहाँ सत्ता, अफसरशाही और अंग्रेज़ी शानो-शौकत का बोलबाला था। उसी शिमला में 2 नवम्बर 1908 को सैय्यदा मोहम्मदी बेगम की ज़िंदगी थम गई, जिसकी कलम सत्ता से नहीं, समाज की जड़ताओं से लड़ रही थी। वह भारत की पहली महिला उर्दू संपादक और मुस्लिम समाज में स्त्री शिक्षा की सबसे बुलंद आवाज़ थी।
बीमारी की हालत में मोहम्मदी बेगम को दिल्ली से शिमला लाया गया। उस दौर में शिमला स्वास्थ्य लाभ का केंद्र, बौद्धिक वर्ग का विश्राम स्थल और सामाजिक बहसों से दूर एक शांत पहाड़ी नगर था। मोहम्मदी बेगम आईं तो शिमला उपचार करवाने के लिए थीं और स्वास्थ्य लाभ भी करना चाहती थीं, पर शिमला उनके जीवन का अंतिम अध्याय बन गया।
पर्दाप्रथा, बहुविवाह और बाल विवाह पर खुली बहस
1908 में जब वे शिमला पहुँचीं, तब तक वे तहज़ीब-ए-निसवाँ की संस्थापक संपादक थीं। 30 से अधिक किताबें लिख चुकी थीं और मुस्लिम समाज में पर्दा, बहुविवाह और बाल विवाह पर खुली बहस छेड़ चुकी थीं। शिमला की ठंडी हवाओं में उनका शरीर कमजोर होता जा रहा था, लेकिन उनके विचार पूरे उपमहाद्वीप में फैल चुके थे।
इतिहास की यह एक विडंबना है कि जिस शिमला में अंग्रेज़ी हुकूमत के फ़ैसले लिखे जाते थे, वहीं एक भारतीय मुस्लिम महिला समाज-सुधार का सबसे साहसी अध्याय पूरा कर रही थी। 30 वर्ष की आयु में,
2 नवम्बर 1908, शिमला में उनका देहांत हो गया। न कोई शोर, न कोई राजकीय सम्मान, लेकिन पीछे छूट गई एक ऐसी वैचारिक विरासत, जिसे मिटाना किसी साम्राज्य के बस में नहीं था।
सैय्यदा मोहम्मदी बेगम का बेटा इम्तियाज़ अली ताज, जिसे वे प्यार से ‘मेरा ताज’ कहती थीं, आगे चलकर उर्दू रंगमंच का चमकता सितारा बना। कम ही लोग जानते हैं कि एक माँ की सोच आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता बन गई। शिमला के मीडिया में को सैय्यदा मोहम्मदी बेगम के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में कम ही बात हुई है।
ब्रिटिश हुकूमत की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला जिस दौर में दुनिया भर में चर्चा का केंद्र थी, शिमला ही मोहम्मदी बेगम के जीवन का अंतिम पड़ाव बना था। यहीं पर भारत की पहली महिला उर्दू संपादक ने आख़िरी साँस ली। शिमला की धरती पर यह साबित हुआ था कि पहाड़ केवल सत्ता के केंद्र ही नहीं होते, विचारों के भी साक्षी होते हैं।
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Jyoti maurya

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