प्रेरक : माउंट एवरेस्ट जीतने वाले पहले भारतीय दल के मेम्बर शिमला मेजर हरिपाल सिंह आहलुवालिया, भारत– चीन युद्ध में रीढ़ की हड्डी में चोट, दिल्ली में खोल दिया चिकित्सा संस्थान
प्रेरक : माउंट एवरेस्ट जीतने वाले पहले भारतीय दल के मेम्बर शिमला मेजर हरिपाल सिंह आहलुवालिया, भारत– चीन युद्ध में रीढ़ की हड्डी में चोट, दिल्ली में खोल दिया चिकित्सा संस्थान
विनोद भावुक। शिमला
इस प्रेरककथा में हम साहस के प्रतीक के रूप में याद कर रहे हैं शिमला में पैदा हुये एक सैन्य ऑफिसर पर्वतारोही, लेखक और समाजसेवक हरिपाल सिंह आहलुवालिया को, जिन्होंने पहाड़ों की तरह अडिग होकर इतिहास में अपना नाम लिखा। उन्होंने माउंट एवरेस्ट जीतने सहित 13 किताबें लिखीं और बियोंड हिमालय” नामक टीवी सीरीज़ बनाई, जो डिस्कवरी और नेशनल जियोग्राफी पर प्रसारित हुई।
1965 में हरिपाल सिंह आहलुवालिया ने भारतीय एवरेस्ट अभियान का हिस्सा बनकर इतिहास रचा। 29 मई 1965 को उन्होंने एचसीएस रावत और फू दोरजे शेरपा के साथ माउंट एवरेस्ट की चोटी पर जीत दर्ज की। एवरेस्ट पर कदम रखने वाला यह पहला भारतीय दल बना। यह भारतीय पर्वतारोहण का पहला सफल अभियान था, जिनसे अगले 17 वर्षों तक एक रिकॉर्ड कायम रखा।

रीढ़ की हड्डी में चोट लगी तो खोल दिया संस्थान
6 नवंबर 1936 को शिमला में हरिपाल सिंह आहलुवालिया का जन्म हुआ। उनके दो भाई और दो बहाने थी। उनके पिता सीपीडब्ल्यूडी में काम करते थे। हरिपाल सिंह ने बचपन में ही फोटोग्राफी, पर्वतारोहण और रॉक क्लाइंबिंग करने लगे थे। सेंट जॉर्ज कॉलेज मसूरी और कॉलेज औरमिलिट्री इंजीनिरिंग कॉलेज पूणे से शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने भारतीय सेना में मेजर के पद तक अपनी सेवाएं दी।
1965 इंडो-पाक युद्ध के दौरान उन्हें रीढ़ की हड्डी में गोली लगी, जिसके बाद उन्हें व्हीलचेयर पर जीवन बिताना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। सेना से स्वैच्छिक रिटायर्डमेंट और अपनी बीमारी से प्रेरणा लेकर उन्होंने दिल्ली में रीढ़ की हड्डी की चोटों के उपचार के लिए राष्ट्रीय स्तर का संस्थान खोल कर विकलांग व्यक्तियों के लिए जीवन बदलने का काम किया।

किताबों में लिख डाले जीवन के अनुभव
हरिपाल सिंह आहलुवालिया ने हिमालय में पर्वतारोहण के अपने अनुभव को दुनिया के साथ शेयर किया। उन्होंने 13 किताबें लिखीं और बियोंड हिमालय’ नामक टीवी सीरीज़ बनाई, जो डिस्कवरी और नेशनल जियोग्राफी पर प्रसारित हुई। उनके लेख और अनुभव शिमला की बर्फीली चोटियों से लेकर विश्वभर के पर्वतों तक का सफर दर्शाते हैं।
हरिपाल सिंह आहलुवालिया को 1965 में पदमश्री और अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया। उन्हें 2002 में पदम भूषण और 2009 में तेनजिन नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवार्ड से सम्मानित किया गया। 14 जनवरी 2022 को 85 साल की उम्र में उनका निधन हुआ, लेकिन अपने पीछे एवरेस्ट जीतने सहित किताबों की बड़ी विरासत छोड़ गए।

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