प्रेरक : भारत के संविधान के निर्माण में कांगड़ा के महान न्यायविद् की खास भूमिका, लाहौर हाई कोर्ट के ची जस्टिस रहे नूरपुर के बख्शी टेक चंद
प्रेरक : भारत के संविधान के निर्माण में कांगड़ा के महान न्यायविद् की खास भूमिका, लाहौर हाई कोर्ट के ची जस्टिस रहे नूरपुर के बख्शी टेक चंद
विनोद भावुक। धर्मशाला
जब हम भारत के संविधान निर्माण की बात करते हैं, तो डॉ. भीमराव आंबेडकर, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नाम सबसे पहले आते हैं। पर ऐसे और भी महानायक हैं, जिन्होंने संविधान निर्माण में अहम भूमिका निभाई, लेकिन वे इतिहास के पन्नों में कहीं खो से गए। कांगड़ा जिले के नूरपुर के महान न्यायविद् बख्शी टेक चंद उनमें एक थे।
बख्शी टेक चंद ने न केवल देश के संविधान निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि जम्मू-कश्मीर के लिए संविधान का मसौदा तैयार करने का गौरव भी हासिल किया। वह एक महान न्यायविद्, कुशल प्रशासक, समाजसेवी और देशभक्त थे। दुर्भाग्य से उनके योगदान को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वह हकदार थे।
लाहौर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस
26 अगस्त, 1883 को कांगड़ा जिले के नूरपुर शहर में जैसी राम के घर जन्मे बख्शी टेक चंद के मन में पढ़ाई के प्रति असाधारण लगाव था। नूरपुर के म्युनिसिपल बोर्ड स्कूल और धर्मशाला के मिशन स्कूल से पढ़ाई कर आगे की पढ़ाई के लिए लाहौर चले गए। गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से स्नातक और यूनिवर्सिटी लॉ कॉलेज, लाहौर से एल.एल.बी. की डिग्री ली।
1922 से 1926 तक लाहौर में एक वकील के रूप में अपनी पहचान बनाई। वे 1922 से 1926 तक पंजाब हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे। 1927 में उन्हें लाहौर हाई कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। 1943 तक उन्होंने इस पद पर सेवा दी और इस दौरान चार बार कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी भी निभाई।
समाजसेवा और संस्थाओं का संचालन
बख्शी टेक चंद एक महान समाजसेवी भी थे। वह डी.ए.वी. कॉलेज सोसायटी के सचिव और अध्यक्षऔर सरदार सर गंगा राम ट्रस्ट के अध्यक्ष रहे। उन्होंने पंजाब मेडिकल एजुकेशन एंड रिलीफ सोसायटी के अध्यक्ष के रूप में काम किया। वे नारायण दास मूलचंद चिल्ड्रन हॉस्पिटल और जसवंत राय चुड़ामणि मैटरनिटी एंड चाइल्ड वेलफेयर ट्रस्ट जैसी संस्थाओं से जेड़े रहे।
बख्शी टेक चंद ने समाज के कमजोर वर्गों, खासकर महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिए अथक प्रयास किए। वह पंजाब इंजीनियरिंग एजुकेशन एंड रिसर्च सोसायटी के अध्यक्ष भी रहे और लाहौर के वी.डी.जे.आर. टेक्निकल इंस्टीट्यूट के गवर्निंग बोर्ड के सदस्य रहे। विभिन्न वर्गों के उत्थान के लिए उनके काम सरहनीय रहे।
सेवानिवृति के बाद खास भूमिका
1943 में न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद 1946 में वह पंजाब प्रांत से भारत की संविधान सभा के लिए चुने गए। यह वह समय था जब देश आजादी की दहलीज पर खड़ा था, लेकिन बंटवारे का दंश भी झेल रहा था। 1947 में जब देश आजाद हुआ और हिंदोस्तान का बंटवारा हुआ, तो बख्शी टेक चंद स्वतंत्र भारत में आकर बस गए।
अक्टूबर 1947 में, जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने राज्य के लिए एक संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए बख्शी टेक चंद को नियुक्त किया। पाकिस्तानी कबाइलियों के कश्मीर पर आक्रमण के कारण संविधान निर्माण का कार्य रुक गया। कश्मीर ने भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए, तो बख्शी टेक चंद राज्य के प्रशासन और संविधान निर्माण की वार्ताओं में शामिल रहे।
पेटेंट कानूनों की समीक्षा
देश की आजादी के बाद, सरकार ने पेटेंट कानूनों की समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया और इसकी अध्यक्षता बख्शी टेक चंद को सौंपी गई। उनकी अध्यक्षता वाली इस समिति की रिपोर्ट ने भारत के पेटेंट कानूनों की नींव रखी। उनके नेतृत्व में हुए कार्यों का प्रभाव आज भी देश के बौद्धिक संपदा अधिकारों पर देखा जा सकता है।
नूरपुर से निकलकर देश की संविधान सभा तक पहुंचने की बख्शी टेक चंद की प्रेरक यात्रा से यह सीख मिलती है कि यदि आपमें लगन और मेहनत करने का जज्बा हो, तो आप न केवल अपना, बल्कि पूरे देश का भविष्य संवार सकते हैं। कांगड़ा की इस धरती ने एक ऐसा सपूत दिया, जिसने भारत के संविधान की नींव रखने में अपना अमूल्य योगदान दिया।
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