कांगड़ा कलम : सात समंदर पार तक खास पहचान, चित्रकला की पहाड़ी परंपरा की संकट में जान

कांगड़ा कलम : सात समंदर पार तक खास पहचान, चित्रकला की पहाड़ी परंपरा की संकट में जान
कांगड़ा कलम : सात समंदर पार तक खास पहचान, चित्रकला की पहाड़ी परंपरा की संकट में जान
हिमाचल बिजनेस। धर्मशाला
हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी केवल प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं, बल्कि यहाँ की कांगड़ा कलम शैली भारतीय लघु चित्रकला की एक अनमोल धरोहर है। इस शैली को भारतीय कला के इतिहास में भावनाओं और प्रकृति का सबसे सूक्ष्म चित्रण माना गया है।
कांगड़ा चित्रकला की शुरुआत 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई। मुग़ल साम्राज्य में जब पतन शुरू हुआ, तो वहाँ के चित्रकार पहाड़ियों की ओर बढ़े और हिमाचल की रियासतों में उन्हें नया आश्रय मिला।
विशेषकर राजा संसार चंद (1775–1823 ई.) के शासनकाल में यह कला अपने स्वर्ण युग में पहुँची। संसार चंद ने न केवल चित्रकारों को संरक्षण दिया, बल्कि उनके लिए विशेष “चित्रशालाएँ” भी स्थापित कीं।
कांगड़ा कलम की सबसे बड़ी विशेषता
भक्ति भाव : श्रीकृष्ण-राधा की प्रेम लीला, भगवद गीता, रामायण-महाभारत के प्रसंग।
प्रकृति चित्रण : ऋतुओं का सूक्ष्म विवरण, पुष्प, वृक्ष, नदियाँ, पशु-पक्षी।
मानवीय भावनाएँ : प्रेम, विरह, आनंद, करुणा और श्रृंगार रस का अद्भुत चित्रण।
इन चित्रों में रेखाएँ बेहद कोमल होती हैं और रंग प्राकृतिक खनिजों एवं वनस्पतियों से तैयार किए जाते थे।
राजदरबार और संरक्षण
कांगड़ा रियासत के राजाओं ने इस कला को राजदरबार का हिस्सा बनाया। राजा संसार चंद के काल में हजारों चित्रों का निर्माण हुआ। इन्हें ‘गीता गोविंद’, ‘रास पंचाध्यायी’, ‘भागवत पुराण’ जैसे ग्रंथों पर आधारित चित्रमालाओं में संरक्षित किया गया।
प्रकृति और प्रेम का संगम
कांगड़ा कलम के चित्रों को देखकर यह स्पष्ट होता है कि उस समय चित्रकार केवल धार्मिक कथाओं तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने प्रकृति की सुंदरता को भी बखूबी उकेरा।
सरोवर किनारे राधा-कृष्ण, वसंत ऋतु में पुष्पों की बहार, शरद ऋतु की चाँदनी, सब कुछ इन चित्रों में जीवंत रूप में दिखता है।
सूखने लगी कांगड़ा कलम की स्याही
आज कांगड़ा चित्रकला को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल चुकी है, लेकिन यह कला परंपरा खतरे में है।
सीमित बाजार, नकली प्रतियां, और कलाकारों के लिए प्रोत्साहन की कमी, इस धरोहर को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है। यही कारण है कि पदमश्री विजय शर्मा जैसे कांगड़ा कलम के विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि तत्काल ठोस कदम न उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियाँ इस धरोहर को केवल संग्रहालयों और किताबों में ही देख पाएंगी।
कांगड़ा कलम केवल चित्रकला नहीं, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और हिमाचल की पहचान है। यह धरोहर हमें बताती है कि कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इतिहास, धर्म, समाज और प्रकृति का जीवंत दस्तावेज़ है।
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Jyoti maurya

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