कांगड़ा की पहली चर्च मैरिज : 10 अक्टूबर 1854 को परिणय सूत्र में बंधे थे मैक्लियड और मैरी
कांगड़ा की पहली चर्च मैरिज : 10 अक्टूबर 1854 को परिणय सूत्र में बंधे थे मैक्लियड और मैरी
विनोद भावुक। कांगड़ा
ब्रिटिश राज के दौरान चर्च मिशीनरी सोसायटी ने 1850 के दशक में कांगड़ा और आसपास के हिस्सों में भी अपना मिशन कार्य शुरू कर दिया था। कांगड़ा में चर्च के विवाह रजिस्टर में दर्ज सबसे पहला
विवाह डोनाल्ड एफ. मैक्लियड और फ़्रांसेस मैरी का था, जो 10 अक्टूबर 1854 को हुआ था। विवाह का संचालन रेव टी एच फ़िज़पैट्रिक ने किया था। मैक्लियड बाद में पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर भी रहे।
19वीं सदी में कांगड़ा के साथ धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक परिवर्तन का अनूठा अध्याय जुड़ा है। 175 साल पहले कांगड़ा में चर्च में शादी का आयोजन और पंजीकरण एक बड़ी सामाजिक घटना थी। सामाजिक परिवर्तन और स्थानीय समुदाय के बीच नई जीवन परंपरा का संकेत था। कांगड़ा में मिशनरियों ने धर्म के साथ लोगों के जीवन के महत्वपूर्ण संस्कारों को भी दर्ज करना शुरू कर दिया था।
कांगड़ा बॉयज़ स्कूल, लड़कियों के लिए पर्दा स्कूल
कांगड़ा मिशन ने बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था शुरू की। मिस्टर बैनर्जी के नेतृत्व में कांगड़ा बॉयज़ स्कूल की स्थापना हुई, जहाँ लगभग 77 स्टूडेंट्स पढ़ते थे। इसी तरह मिस आइडा रुथर ने लड़कियों के लिए पर्दा स्कूल शुरू किया, जिसमें 15 मुस्लिम लड़कियां अध्ययन करती थीं। वे हिंदू और ईसाई बच्चों के लिए अलग स्कूल संचालित कर रही थीं।
चर्च मिशीनरी सोसायटी ने 1850 के दशक के आसपास कांगड़ा और आसपास के हिस्सों में मिशन कार्य शुरू कर दिया था, जिसके तहत मिशनरी स्थानीय समुदाय में शिक्षा और धर्म सम्बन्धी गतिविधियों को प्रोत्साहित करने लगे थे। चर्च मिशीनरी सोसायटी के रिकॉर्ड के अनुसार उस साल मिशन के जरिये कुल लगभग 120 स्थानीय लोगों को चर्च ऑफ क्राइस्ट में शामिल किया गया।
जन्म, शादी और मृत्यु का पंजीकरण
1885 में प्रकाशित पुस्तक, ‘द पंजाब एंड सिंध मिशन ऑफ चर्च मिशनरी सोसायटी’ में रॉबर्ट क्लार्क लिखते हैं कि कांगड़ा में आधिकारिक पंजीकरण, विवाह और बपतिस्मा जैसे संस्कार लिखित इतिहास का हिस्सा बनने लगे थे। शिक्षा की बुनियादी डाली जा रही थी स्थानीय लोगों के बीच नई भाषा और नए विचार पहुंचने लगी थे।
मिशन रजिस्टर में जन्म, शादी और मृत्यु का पंजीकरण होने लगा था। कांगड़ा ने 19वीं सदी के मध्य अपने पारंपरिक जीवन में शिक्षा, आध्यात्मिक आदान प्रदान और सामाजिक परिवर्तन का अनुभव किया। यही अनुभव बाद के समय में आधुनिक शिक्षा और विविध सांस्कृतिक पहचान की ओर बढ़ने का एक प्रारंभिक संकेत बना।
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