‘हास्य रस का बादशाह’ : शिमला में हंसते- हंसाते सिस्टम की बखियां उधेड़ देता था हास्य कवि ईश्वर सिंह ‘ईशर’, रचनाओं का मशहूर पात्र था ‘भैया’, ‘मेरा मरना’ कविता से मिली राष्ट्रीय पहचान

‘हास्य रस का बादशाह’ : शिमला में हंसते- हंसाते सिस्टम की बखियां उधेड़ देता था हास्य कवि ईश्वर सिंह ‘ईशर’, रचनाओं का मशहूर पात्र था ‘भैया’, ‘मेरा मरना’ कविता से मिली राष्ट्रीय पहचान
‘हास्य रस का बादशाह’ : शिमला में हंसते- हंसाते सिस्टम की बखियां उधेड़ देता था हास्य कवि ईश्वर सिंह ‘ईशर’, रचनाओं का मशहूर पात्र था ‘भैया’, ‘मेरा मरना’ कविता से मिली राष्ट्रीय पहचान
विनोद भावुक। शिमला
बहुत कम लोग जानते हैं कि शिमला पंजाबी हास्य-व्यंग्य कविता के सम्राट ईश्वर सिंह ‘ईशर’ के जीवन का एक अहम पड़ाव रहा है। शिमला में डाकघर की नौकरी करते हुए एक कवि ने समाज को हंसते-हंसाते आईना दिखाया। 1949 में दिल्ली से उनका तबादला शिमला डाकघर में हुआ। ‘ईशर’ ने शिमला की ठंडी हवाओं, पहाड़ी जीवन और सरकारी दफ्तरों की दुनिया ने उनके व्यंग्य को और धार दी।
1892 में रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) के कानेट गांव में जन्मे ईश्वर सिंह ‘ईशर’ ने बहुत कम उम्र में कविता लिखनी शुरू कर दी थी। उनकी शुरुआती रचनाएं धार्मिक और गंभीर थीं, लेकिन 1928 के बाद उन्होंने हास्य को अपनी पहचान बना लिया। 1947 के भारत विभाजन के बाद जब उनका परिवार दिल्ली आया, जहां से दो साल बाद पोस्ट विभाग की जॉब करने वे शिमला पहुंचे।
डाकघर की मेज़ से कवि दरबार तक
शिमला में रहते हुए ईश्वर सिंह दिन में सरकारी कर्मचारी थे और शाम को कवि। काग़ज़ों, फाइलों और सरकारी अनुशासन के बीच बैठा यह कवि समाज की विसंगतियों को बड़ी बारीकी से देखता था। उनकी रचनाओं का प्रसिद्ध पात्र ‘भैया’ था, जो कभी आम आदमी, कभी पाखंडी तो कभी भोला होता था। असल में उसी समाज का पात्र था, जिसे ईश्वर सिंह रोज़ देखते थे।
शिमला जैसे शहर में, जहां अफ़सरशाही और आम जनता एक ही सड़क पर पैदल चलते हैं, उनका व्यंग्य और अधिक असरदार बन गया। यहीं से वे देश-भर के कवि दरबारों में बुलाए जाने लगे। 1955 में आकाशवाणी पर प्रसारित कविता ‘मेरा मरना’ ने उन्हें रातों-रात राष्ट्रीय पहचान दिलाई। इसके बाद वे जहां भी मंच पर आए, हजारों की भीड़ जुटने लगी।
हास्य रस के बादशाह का खिताब
ईश्वर सिंह ‘ईशर’ की इस सफलता की जड़ें शिमला के अनुशासित, एकांत और सोचने वाले जीवन में थीं। वे सिर्फ़ हंसाने वाले कवि नहीं थे। वे धार्मिक पाखंड पर चोट करते थे, अमीरी-गरीबी के फर्क़ पर सवाल उठाते थे और सत्ता और सामाजिक ढोंग का मज़ाक उड़ाते थे। वे इतनी सहज भाषा में करते थे कि आम आदमी खुद को कविता में देख लेता था। इसी कारण उन्हें ‘हास्य रस का बादशाह’ कहा गया।
ईश्वर सिंह ‘ईशर’ इस बात का उदाहरण हैं कि महान साहित्य सिर्फ़ विश्वविद्यालयों में नहीं, डाकघर की नौकरी करते हुए शिमला जैसे शहर की खामोशी में जन्म लेता है। साल 1966 में ईश्वर सिंह ‘ईशर’ का निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी हमें यह सिखाती हैं कि हंसी सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, एक मजबूत सामाजिक हथियार भी हो सकती है।
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Jyoti maurya

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