कृष्ण कुमार ‘तूर’ : लाहौर से शायरी की धर्मशाला तक परवाज़, सीधे दिल में उतर जाते हैं अल्फ़ाज़
कृष्ण कुमार ‘तूर’ : लाहौर से शायरी की धर्मशाला तक परवाज़, सीधे दिल में उतर जाते हैं अल्फ़ाज़
विनोद भावुक। धर्मशाला
‘कांटों को गुलाब दे रहा हूं।
दुनिया को किताब दे रहा हूँ।।’
आज की इस रोचक और प्रेरक कहानी के नायक हैं इस शेर के शायर कृष्ण कुमार तूर। उनका जन्म पाकिस्तान में हुआ और जिंदगी के 14 साल उर्दू की कल्चरल और लिट्रेचर केपिटल कहे जाने वाले अभिवाजित भारत के ऐतिहासिक लाहौर शहर में बीते।
देश आजाद हुआ, पर भारत और पाकिस्तान के रूप में दो देश बन गए। कृष्ण कुमार को भी अपने परिजनों संग लाहौर छोड़ना पड़ा। परिवार कांगड़ा जिला मुखयालय धर्मशाला के खनियारा रोड इलाके में बस गया। यही उनकी शायरी परवान चढ़ी।
लड़कपन में उर्दू से मुहब्बत, बुढ़ापे तक इश्क
किशोर उम्र में कृष्ण कुमार उर्दू से ऐसी बेपनाह मुहब्बत हुई, जिसकी कसक 92 साल की उम्र में भी देखी जा सकती है। उर्दू काव्य संग्रह ‘ग़ुर्फ़ा-ए-ग़ालिब के लिए वर्ष 2012 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कृष्ण कुमार तूर की शायरी न केवल हिमाचल प्रदेश, बल्कि पूरे भारत में सराही जाती हैं।
इस उम्र में भी वे मुशायरों में शिरकत करते देखे जा सकते हैं। उन्होंने धर्मशाला से प्रकाशित होने वाली ‘सरसब्ज़’ नामक उर्दू पत्रिका का संपादन भी किया है। कृष्ण कुमार तूर ने अपने जीवन के साठ दशक उर्दू शायरी जमीन को उपजाऊ बनाने को दिये हैं।
आधुनिकता के साथ पारंपरिक उर्दू शायरी
राज्य पर्यटन विभाग से सेवानिवृत कृष्ण कुमार तूर का कलाम उर्दू शायरी की समृद्ध परंपरा का हिस्सा है। उनकी शायरी में ग़ज़ल, नज़्म और शेर की विविध शैलियाँ देखने को मिलती हैं। उनकी प्रमुख काव्य कृतियों में ग़ुर्फ़ा-ए-ग़ालिब, शेर-ए-शगुफ़्त, मुस्क-ए-मुनव्वर, रफ़्ता-ए-रमज़ और आलम-ए-आइन प्रमुख हैं।
कृष्ण कुमार तूर की शायरी में आधुनिकता के साथ पारंपरिक उर्दू शायरी की गहराई भी देखने को मिलती है।उनकी शायरी को विभिन्न साहित्यिक मंचों पर प्रस्तुत किया गया है। वे छोटी छोटी चीज़ों में भी चमत्कार ढूंढते हैं और अपनी बात को सरल शब्दों में व्यक्त करते हैं।
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