‘शोले’ जैसी कालजयी फिल्म के अनदेखे नायक पठानकोट के कुलदीप सूद, साउंड रिकॉर्डिंग और ऑडियो मास्टरिंग की विरासत की अनसुनी कहानी
‘शोले’ जैसी कालजयी फिल्म के अनदेखे नायक पठानकोट के कुलदीप सूद, साउंड रिकॉर्डिंग और ऑडियो मास्टरिंग की विरासत की अनसुनी कहानी
विनोद भावुक/अरविंद शर्मा। धर्मशाला
जब सिनेमा में संवाद थम जाते हैं और संगीत मौन हो जाता है, तब साउंड कहानी कहता है। ‘शोले’ जैसी कालजयी फिल्म में झूले की चरमराहट, गब्बर के आने से पहले सुनाई देती खौफनाक खामोशी, ये सब दर्शकों के दिल में उतर जाने वाली ध्वनियाँ हैं। परदे के पीछे रहकर सिनेमा को आत्मा देने वाले ऐसे ही अनदेखे नायकों में एक नाम है कुलदीप सूद।
भारतीय सिनेमा में साउंड रिकॉर्डिंग और ऑडियो मास्टरिंग की उस विरासत को याद करने की कोशिश है, जिसने दृश्य को संवेदना दी, कहानी को गहराई दी और सिनेमा को सचमुच ‘सुना’ जाने लायक बनाया। कुलदीप सूद के काम से फिल्म में ध्वनि दृश्यों का भावनात्मक प्रभाव और गहराई पैदा हुई। पात्रों की उपस्थिति और वातावरण वास्तविक लगने लगे।
क्लासिक ‘शोले’ की फिर से चर्चा
अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, जया बच्चन, अमजद खान जैसे सितारों से सजी ‘शोले’ थिएटर्स में एक बार फिर से रिलीज हुई है। 50वीं सालगिरह पर दर्शकों को इसकी ओरिजनल एंडिंग दिखाई गई है, जिसमें गब्बर की मौत होती है। इस मूवी ने 1975 में कई ताबड़तोड़ रिकॉर्ड बनाए थे। 3 करोड़ से बनी ये मूवी थिएटर्स में 286 हफ्ते चली थी और इसके 25 करोड़ टिकट भी बिके थे।
फिल्म का अनदेखा हीरो
फिल्म प्रॉडक्शन में साउंड रिकॉर्डिस्ट का काम अक्सर पर्दे के पीछे होता है। ‘शोले’ जैसी क्लासिक फिल्म में साउंड एफ़ेक्ट्स से आवाज़ को आत्मा देने वाले अपने समय के उत्कृष्ट साउंड रिकॉर्डिस्ट के बारे में कम ही चर्चा हुई है। हिमाचल प्रदेश का गेटवे कहे जाने वाले पंजाब के पठानकोट कस्बे से निकल कर मुंबई में बड़ा मुकाम बनाने कुलदीप सूद को भारतीय सिनेमा का अनदेखा हीरो कहा जाता है।
सीखीं साउंड की बारीकियां
पठानकोट से मैथ और फिजिक्स में स्नातक करने के बाद कुलदीप सूद फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट पूणे के पहले बैच के स्टूडेंट्स बने। यहाँ उन्होंने साउंड रिकॉर्डिंग की बारीकियां सीखीं और हिन्दी सिनेमा में साउंड रिकॉर्डिंग तथा ऑडियो मास्टरिंग की फील्ड में उतर गए। पाँच दशक तक हिन्दी सिनेमा में अपने हुनर का लोहा मनवाया है। 82 साल के कुलदीप सूद बांद्रा की पाली हिल में रहते हैं।
साउंड रिकॉर्डिंग तथा ऑडियो मास्टरिंग
कुलदीप सूद ने कई प्रसिद्ध फिल्मों में काम किया, जिनमें 1975 में बनी शोले, 1992 में बनी खुदा गवाह, कल हो न हो, ॐ शांति ॐ जैसी हिट शामिल हैं। उन्होंने ‘ट्रैफिक सिग्नल’ ‘हम तुम और घोस्ट’,
शागिर्द सहित कई अन्य फिल्मों में भी साउंड इफेक्ट का काम किया। साउंड रिकॉर्डिंग तथा ऑडियो मास्टरिंग से सिनेमा को भरपूर लाभ मिला और फिल्में तकनीकी रूप से ज़्यादा प्रभावशाली बनीं।
काम् के लिए मिले सम्मान
साउंड इंडस्ट्री में उनके योगदान को कई बार सम्मानित किया गया है। साउंड एसोशिएशन ऑफ इंडिया ने कुलदीप सूद को उच्च श्रेणी के पुरस्कार से सम्मानित किया। पुरस्कार खासतौर पर उनके ध्वनि रिकॉर्डिंग तथा फिल्म साउंड डिज़ाइन में गुणवत्ता और पारंपरिक तकनीक के उपयोग की वजह से मिला। आज भी फ़िल्मी ध्वनि के शौकीन और प्रोफेशनल्स उनके शानदार काम को याद करते हैं।
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