कुल्लू की सभ्यता: सात नदियों की भूमि ‘सप्त सिंधु’ और परिवार आधारित संस्कृति
कुल्लू की सभ्यता: सात नदियों की भूमि ‘सप्त सिंधु’ और परिवार आधारित संस्कृति
हिमाचल बिजनेस। कुल्लू
हिमालय की गोद में बसी कुल्लू घाटी केवल प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यह प्राचीन आर्य सभ्यता और परिवार-व्यवस्था की ऐतिहासिक जड़ों से भी जुड़ी मानी जाती है। 1897 में प्रकाशित पुस्तक Ridpath’s History of the World में वर्णित ‘सप्ता सिंधु’ क्षेत्र के सामाजिक जीवन का चित्रण हमें उस दौर की झलक देता है, जब परिवार, विवाह और घर की अवधारणा समाज की नींव हुआ करती थी।
Ridpath’s History of the World के लेखक John Clark Ridpath ने आर्य जातियों के उद्गम, प्रवास और सामाजिक संरचना पर विस्तार से लिखा है। पुस्तक में ‘सप्त सिंधु’ (सात नदियों की भूमि) का उल्लेख मिलता है, जिसे आज के उत्तर-पश्चिम भारत और हिमालयी क्षेत्र से जोड़ा जाता है। इसी संदर्भ में कुल्लू घाटी की पारंपरिक बस्तियों और घरों की छवियाँ भी मिलती हैं, जो उस युग के पारिवारिक जीवन और सामाजिक संगठन की कहानी कहती हैं।
एक पत्नी, एक घर, एक संस्कार
पुस्तक में वर्णित है कि आर्य समाज में एक पत्नी और एक पति की परंपरा (मोनोगैमी) मूल आधार थी। यह उस समय की अन्य बहुपत्नी या बहुपति प्रथाओं से भिन्न थी। कुल्लू और आसपास के क्षेत्रों में घर केवल निवास स्थान नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक इकाई हुआ करता था। घर का निर्माण सामूहिक श्रम से होता और परिवार का मुखिया सुरक्षा और आजीविका की जिम्मेदारी निभाता।
स्त्री होती थी परिवार की धुरी
स्त्री को केवल ‘स्वामित्व’ की वस्तु नहीं, बल्कि परिवार की धुरी माना जाता। यह उल्लेख दर्शाता है कि हिमालयी समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों में सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव का महत्व था। कुल्लू की ऐतिहासिक पहचान कहीं गहरी है। 19वीं सदी के दस्तावेजों और चित्रों में कुल्लू के पारंपरिक लकड़ी-पत्थर के घर, पहाड़ी जीवनशैली और सामुदायिक व्यवस्था का सजीव चित्रण मिलता है।
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