कुल्लू वास : कुल्लू से लंदन तक बौद्ध कला की अमूल्य विरासत, डेढ़ हज़ार साल पुरानी कांस्य कृति

कुल्लू वास : कुल्लू से लंदन तक बौद्ध कला की अमूल्य विरासत, डेढ़ हज़ार साल पुरानी कांस्य कृति
कुल्लू वास : कुल्लू से लंदन तक बौद्ध कला की अमूल्य विरासत, डेढ़ हज़ार साल पुरानी कांस्य कृति
हिमाचल बिजनेस । केलंग
हिमालय की शांत वादियों में छिपी विरासत कभी-कभी ऐसे सामने आती है, जो इतिहास की धारा ही बदल देती है। ऐसी ही एक अद्भुत खोज है ‘कुल्लू वास (Kulu Vase), एक प्राचीन बौद्ध कांस्य पात्र, जिसे भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे शुरुआती सजावटी धातु कलाकृतियों में गिना जाता है। वर्तमान में यह अनमोल धरोहर ब्रिटिश म्यूज़ियम लंदन में सुरक्षित है, लेकिन इसकी जड़ें हिमाचल प्रदेश की मिट्टी में गहराई से समाई हैं।
वर्ष 1857 में लाहौल क्षेत्र में केलंग से लगभग 18 किलोमीटर दूर गांधोला मठ के पास हुए एक भूस्खलन ने इतिहास का एक दबा हुआ अध्याय उजागर किया। मिट्टी के नीचे करीब 1500 वर्षों से दबी एक प्राचीन बौद्ध कुटिया सामने आई। यहीं से यह कांस्य पात्र प्राप्त हुआ, जिसे बाद में ‘कुल्लू वास’ के नाम से जाना गया।
करीब 15 सेंटीमीटर ऊंचा यह गोलाकार पात्र
ब्रिटिश राज के स्थानीय राजनीतिक एजेंट मेजर हे के माध्यम से यह पात्र पहले इंडिया म्यूज़ियम लंदन पहुंचा और 1880 में इसे ब्रिटिश म्यूज़ियम के एशियाई संग्रह में शामिल कर लिया गया। करीब 15 सेंटीमीटर ऊंचा यह गोलाकार पात्र पहली शताब्दी ईसा पूर्व का माना जाता है। इसके चौड़े मुख और ऊंची गर्दन पर की गई नक्काशी इसे विशिष्ट बनाती है।
वास पर उकेरी गई फ्रीज़ एक भव्य राजसी जुलूस का दृश्य प्रस्तुत करती है। चार घोड़ों से खिंचता रथ, जिस पर एक सम्राट या दरबारी व्यक्ति सवार हाई और उसके पीछे घुड़सवार सेना। एक अन्य राजसी पात्र हाथी पर सवार
जुलूस के अंत में बांसुरी और वीणा बजाती दो महिला संगीतकार यह दृश्य न केवल तत्कालीन सत्ता और वैभव को दर्शाता है, बल्कि संगीत, सैन्य शक्ति और शाही संस्कृति के समन्वय को भी उजागर करता है।
राजसत्ता और धार्मिक प्रतीकों का मेल
कुल्लू वास पर कोई शिलालेख या लेखन नहीं है, जिससे इसके पात्रों या समारोह का स्पष्ट अर्थ निकालना कठिन हो जाता है। यही रहस्य इसे और भी आकर्षक बनाता है। विद्वानों का मानना है कि यह प्रारंभिक बौद्ध काल में राजसत्ता और धार्मिक प्रतीकों के मेल को दर्शाता है, जो उस दौर की सांस्कृतिक समझ को गहराई प्रदान करता है।
कुल्लू वास केवल एक संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश की प्राचीन कला, बौद्ध परंपरा और अंतरराष्ट्रीय ऐतिहासिक जुड़ाव का प्रतीक है। कुल्लू वास याद दिलाता है कि हिमालयी क्षेत्र केवल प्राकृतिक सौंदर्य ही नहीं, बल्कि सभ्यता और संस्कृति की भी जन्मभूमि रहा है।
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Jyoti maurya

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