कभी भारत–तिब्बत–चीन संवाद का प्रवेश द्वार था लाहौल, गुरु नानक की यात्राओं का साक्षी, शंघाई के गुरुद्वारों तक हिमालय का भूला हुआ अध्याय

कभी भारत–तिब्बत–चीन संवाद का प्रवेश द्वार था लाहौल, गुरु नानक की यात्राओं का साक्षी, शंघाई के गुरुद्वारों तक हिमालय का भूला हुआ अध्याय
कभी भारत–तिब्बत–चीन संवाद का प्रवेश द्वार था लाहौल, गुरु नानक की यात्राओं का साक्षी, शंघाई के गुरुद्वारों तक हिमालय का भूला हुआ अध्याय
विनोद भावुक। केलंग
लाहौल–स्पीति को हम दुर्गम घाटियों, बर्फ़ीले दर्रों और सीमावर्ती ज़िले के रूप में जानते हैं, लेकिन इतिहास के पन्नों में यही लाहौल एशिया की उन प्राचीन राहों में शामिल था, जहां से आस्था, व्यापार और संस्कृतियां एक-दूसरे से जुड़ती थीं। कम लोग जानते हैं कि सिख इतिहास और चीन के बीच संबंधों की सबसे पुरानी कड़ी भी इन्हीं हिमालयी रास्तों से होकर गुज़रती है और उस कड़ी का नाम है लाहौल।
सिख परंपरा के अनुसार, गुरु नानक देव जी अपनी उदासियों के दौरान हिमालय की ओर आए। माना जाता है कि वे मणिकर्ण से होते हुए रोहतांग और चंदनकला दर्रों को पार कर लाहौल स्पीति पहुंचे और फिर सप्रांग दर्रे से तिब्बत की ओर बढ़े। यहीं से उनकी यात्रा मानसरोवर और कैलाश तक गई।
चीन में: बाबा फूसा और तिब्बत में: नानक लामा
तिब्बत और चीन के इलाक़ों में गुरु नानक को आज भी अलग-अलग नामों से याद किया जाता है। चीन में: बाबा फूसा और तिब्बत में: नानक लामा। कैलाश–मानसरोवर क्षेत्र में सिद्ध योगियों के साथ उनका संवाद, आस्था और सामाजिक सरोकारों पर आधारित था, जहां गुरु नानक ने पहाड़ों की कठिन यात्रा को ईश्वर में विश्वास से संभव बताया और शासकों के अन्याय पर खुलकर बात की।
18वीं सदी में सिख मिसलों और बाद में सिख साम्राज्य के दौर में अमृतसर से लेकर यारकंद, तुरफ़ान और चीनी तुर्किस्तान तक व्यापारिक कारवां चले। इन मार्गों का एक अहम हिस्सा हिमालयी क्षेत्र था, जिसमें लाहौल–स्पीति भी शामिल था। यहीं से ऊन, शॉल, धातु और कृषि उत्पाद आगे बढ़ते, और बदले में रेशम, घोड़े और सोना भारत पहुंचता था।
तिब्बत युद्ध और लाहौल की परछाईं
1841 में डोगरा–सिख सेनापति ज़ोरावर सिंह का तिब्बत अभियान इतिहास का निर्णायक मोड़ बना। मानसरोवर तक पहुँची सेना को कड़ाके की सर्दी और क़िंग–तिब्बती फौजों का सामना करना पड़ा। युद्ध के बाद कई सिख–डोगरा सैनिक तिब्बत में बंदी बने। इनमें से बड़ी संख्या में बंदी सैनिकों ने भारत लौटने के बजाय तिब्बत में ही जीवन बसाया।
उन्होंने स्थानीय महिलाओं से विवाह किए, फल–उद्यान लगाए और खुबानी, सेब व अंगूर की खेती तिब्बत में शुरू की। स्थानीय लोग उन्हें ‘सिंगपा’ कहते थे, यानी पंजाबी सिख। आगे चलकर यही समुदाय सिंगपा खाचे कहलाया, जो ल्हासा के मुस्लिम समाज का भी हिस्सा बना।
शंघाई के गुरुद्वारे और लाहौल की स्मृति
औपनिवेशिक दौर में सिख समुदाय चीन के बड़े शहरों ख़ासकर शंघाई में संगठित हुआ। 1908 में डोंग बाओशिंग रोड गुरुद्वारा और 1916 में गॉर्डन रोड गुरुद्वारा बने। इन गुरुद्वारों में गुरु नानक की हिमालयी यात्राओं और तिब्बत–चीन संपर्क की स्मृतियां जीवित रहीं। रवींद्रनाथ टैगोर, ध्यानचंद, और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे व्यक्तित्व भी इन गुरुद्वारों से जुड़े। यह सिख विरासत केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एशियाई इतिहास का साझा अध्याय है।
आज जब लाहौल–स्पीति को सीमांत ज़िला कहा जाता है, तब यह याद रखना ज़रूरी है कि यही इलाक़ा कभी भारत–तिब्बत–चीन संवाद का प्रवेश द्वार था और गुरु नानक की यात्राओं का साक्षी और एशिया की सभ्यताओं को जोड़ने वाला शांत हिमालयी सेतु था। यह विरासत सिर्फ़ अतीत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए संवाद, सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक सम्मान का संदेश है।
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Jyoti maurya

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