भारत की पहली महिला इलेक्ट्रिकल इंजीनियर ललिता ने शिमला से की थी करियर की शुरुआत, स्मोकलेस ओवन और जेलैक्ट्रोमोनियम पर रिसर्च में दिया योगदान

भारत की पहली महिला इलेक्ट्रिकल इंजीनियर ललिता ने शिमला से की थी करियर की शुरुआत, स्मोकलेस ओवन और जेलैक्ट्रोमोनियम पर रिसर्च में दिया योगदान
भारत की पहली महिला इलेक्ट्रिकल इंजीनियर ललिता ने शिमला से की थी करियर की शुरुआत, स्मोकलेस ओवन और जेलैक्ट्रोमोनियम पर रिसर्च में दिया योगदान
विनोद भावुक। शिमला
भारत की पहली महिला इंजीनियर अय्यलासोमयाजुला ललिता के पेशेवर जीवन की शुरुआत शिमला से हुई थी।
में उन्होंने तकनीक, शोध और नवाचार के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की डिग्री लेने के बाद ललिता ने सेंट्रल स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइज़ेशन, शिमला से अपने पेशेवर करियर की शुरुआत की।
शांथा मोहन की पुस्तक, ‘रूट्स एंड विंग्स : इंस्पायरिंग स्टोरीस ऑफ इंडियन वुमेन इन इंजीनियरिंग’ में लिखते हैं कि शिमला में तकनीकी मानकों, बिजली और औद्योगिक नवाचारों पर काम हो रहा था। शिमला में ललिता ने अपने पिता के साथ मिलकर स्मोकलेस ओवन और एक अनोखे बिजली आधारित वाद्य यंत्र जेलैक्ट्रोमोनियम पर शोध में योगदान दिया।
भाखड़ा-नंगल परियोजना के सब-स्टेशन किए डिज़ाइन
ललिता का करियर सेंट्रल स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइज़ेशन, शिमला तक नहीं रुका। उन्होंने कोलकाता की एसोसिएट इलेक्ट्रिकल इंडस्ट्री के साथ काम करते हुए उस दौर की सबसे महत्वपूर्व बिजली परियोजना भाखड़ा-नंगल डैम के निर्माण में खास भूमिका अदा की। इस ऐतिहासिक परियोजना में ललिता ने ट्रांसमिशन लाइन और सब-स्टेशन डिज़ाइन किए।
1964 में वे न्यूयॉर्क में महिला इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की पहली अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस हुई। ललिता इस अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस शामिल होने वाली भारत की इकलौती महिला इंजीनियर थीं। उनकी यह उपलब्धि अपने आप में एक मील का पत्थर थी। इस कॉन्फ़्रेंस में उनकी मौजूदगी भारतीय महिला की क्षमताओं का माजबूर परिचय था।
आसान नहीं था जीवन, हुनर से पाई मंजिल
27 अगस्त 1919 को मद्रास (आज का चेन्नई) में जन्मी ललिता की ज़िंदगी आसान नहीं थी। 15 वर्ष की उम्र में उनका विवाह हो गया। 18 वर्ष की उम्र में वे मां बन गईं और फिर पति का असामयिक निधन हो गया। इन सबके बावजूद ललिता ने हार नहीं मानी। उनके पिता पप्पू सुब्बा राव शिक्षाविद थे, उन्होंने ललिता को आगे बढ़ने का पूरा समर्थन दिया।
पुरुषों के वर्चस्व वाले कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग, गिंडी में दाख़िला लेकर ललिता ने 1943 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल कर इतिहास रच दिया। वे भारत की पहली महिला इंजीनियर बनीं। ललिता का जीवन इस बात का प्रमाण है कि संघर्ष, शिक्षा और अवसर मिलें तो भारतीय नारी इतिहास लिख सकती है।
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Jyoti maurya

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