ब्रिटिश भारत के होम सेक्रेटरी की याद को जिंदा रखे मंडी का एमर्सन हाउस, मंडी रियासत के सुपरिंटेंडेंट और सेटलमेंट ऑफिसर रहे थे एमर्सन

ब्रिटिश भारत के होम सेक्रेटरी की याद को जिंदा रखे मंडी का एमर्सन हाउस, मंडी रियासत के सुपरिंटेंडेंट और सेटलमेंट ऑफिसर रहे थे एमर्सन
ब्रिटिश भारत के होम सेक्रेटरी की याद को जिंदा रखे मंडी का एमर्सन हाउस, मंडी रियासत के सुपरिंटेंडेंट और सेटलमेंट ऑफिसर रहे थे एमर्सन
सत्य प्रकाश। मंडी
ब्रिटिश दौर में मंडी रियासत औपनिवेशिक प्रशासन के लिए एक ऐसी प्रयोगशाला बनी, जिसने भविष्य के बड़े अफसर तैयार हुए। इन्हीं में एक बड़ा नाम है सर हरबर्ट विलियम एमर्सन, जो आगे चलकर पंजाब के गवर्नर और ब्रिटिश भारत का प्रभावशाली होम सेक्रेटरी बने। मंडी का एमर्सन हाउस सौ साल बाद मंडी के सुपरिंटेंडेंट और सेटलमेंट ऑफिसर की याद तारो ताज़ा रखे है।
1 जून 1881 को इंग्लैंड के वेस्ट किर्बी में जन्मे हरबर्ट एमर्सन की शिक्षा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के मैग्डलीन कॉलेज से हुई। 1904 में उनका चयन इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) में हुआ, उस समय की सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा थी। एमर्सन का मंडी रियासत से गहरा रिश्ता 1916 में जुड़ा, जब उन्हें मंडी रियासत का सुपरिंटेंडेंट और सेटलमेंट ऑफिसर नियुक्त किया गया।
मंडी से भारत के होम सेक्रेटरी तक का सफर
मंडी रियासत के सुपरिंटेंडेंट और सेटलमेंट ऑफिसर का पद केवल राजस्व अभिलेखों तक सीमित नहीं था। यह पहाड़ी समाज, भूमि व्यवस्था, वन, जल और स्थानीय परंपराओं को समझने की ज़िम्मेदारी थी। मंडी जैसी दुर्गम पहाड़ी रियासत में ज़मीनों का बंदोबस्त, किसानों और जागीरदारों के बीच संतुलन और रियासती प्रशासन ने एमर्सन को एक व्यावहारिक और कठोर प्रशासक बनाया।
गवर्नमेंट ऑफ पंजाब की ‘पंजाब एडमिनिस्टरेटिव रिपोर्ट 1934 में’ दर्ज है कि मंडी में अनुभव लेने के बाद एमर्सन साल 1917 में पंजाब में असिस्टेंट कमिश्नर व सेटलमेंट ऑफिसर, 1922 में डिप्टी कमिश्नर और साल 1930 से 1933 तक ब्रिटिश भारत के होम सेक्रेटरी रहे। होम सेक्रेटरी के रूप में एमर्सन का कार्यकाल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे संवेदनशील दौर से जुड़ा है।
गांधी–इरविन समझौता और ऐतिहासिक विवाद
होम सेक्रेटरी रहते हुए एमर्सन की महात्मा गांधी से बातचीत हुई, जिसके परिणामस्वरूप 1931 में गांधी–इरविन समझौता अस्तित्व में आया। हालाँकि, इसी दौर में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी दिए जाने का निर्णय हुआ, जिसने पूरे देश में उबाल ला दिया। जनता के लिए एमर्सन का नाम औपनिवेशिक कठोरता और ब्रिटिश सत्ता की प्रतीकात्मक छवि के रूप में दर्ज हो गया।
एमर्सन 1933 से 1938 तक पंजाब के गवर्नर रहे। यह वही पंजाब था जो किसान आंदोलनों, राजनीतिक उथल-पुथल और सांप्रदायिक तनाव से गुजर रहा था। उनका प्रशासनिक दृष्टिकोण कहीं न कहीं मंडी जैसे पहाड़ी राज्यों में सीखे गए ‘ग्राउंड लेवल गवर्नेंस’ से प्रभावित था। छोटी सी मंडी रियासत ने वैश्विक इतिहास के निर्माण में मौन लेकिन निर्णायक भूमिका निभाती।
मंडी रियासत का अप्रत्यक्ष प्रभाव
इतिहासकार मानते हैं कि मंडी जैसी रियासतों में तैनाती ने ब्रिटिश अफसरों को भारत की वास्तविक सामाजिक बनावट समझाई। एमर्सन के लिए मंडी रियासत प्रशासनिक प्रशिक्षण स्थल, पहाड़ी समाज को समझने का अवसर और जमीनी शासन का अनुभव बनी, जिसने आगे चलकर उन्हें बड़े निर्णयों के लिए तैयार किया।
1938 में एमरसन को लीग ऑफ नेशंस का हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजीज़ बनाया गया। उन्होंने यूरोपीय यहूदी शरणार्थियों और रूसी विस्थापितों के पुनर्वास पर कार्य किया। 13 अप्रैल 1962 को लंदन में एमर्सन का निधन हुआ। उनका जीवन का सफर गवाही देता है कि मंडी रियासत केवल स्थानीय इतिहास नहीं, औपनिवेशिक भारत की प्रशासनिक रीढ़ का हिस्सा रही है।
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Jyoti maurya

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