कांगड़ा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में जन्मा मंडी का शिवरात्रि महोत्सव, कांगड़ा में कैद राजा की मंडी में राजनीतिक वापसी को जनआंदोलन में बदलने की जीवंत परंपरा
कांगड़ा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में जन्मा मंडी का शिवरात्रि महोत्सव, कांगड़ा में कैद राजा की मंडी में राजनीतिक वापसी को जनआंदोलन में बदलने की जीवंत परंपरा
विनोद भावुक। धर्मशाला
पहाड़ी रियासतों के इतिहास में 18वीं शताब्दी का उत्तरार्ध सत्ता संघर्ष, सामरिक गठबंधनों और क्षेत्रीय वर्चस्व की सियासत से भरा रहा। साल 1792 में कांगड़ा के शक्तिशाली शासक महाराजा संसार चंद ने अपनी विस्तारवादी नीति के कारण अपने एक सैन्य अभियान के दौरान मंडी रियासत को पराजित कर मंडी के 13वें राजा ईश्वरी सेन को बंदी बना लिया गया।
डिस्ट्रिक्ट गेजेटियर कांगड़ा के मुताबिक यह केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि कांगड़ा की क्षेत्रीय प्रभुत्व नीति का हिस्सा था। महाराजा संसार चंद इसके माध्यम से पहाड़ी रियासतों पर कांगड़ा का प्रभाव स्थापित कर रहे थे। राजा ईश्वरी सेन लगभग 12 वर्षों तक राजनीतिक कैदी रहे। उनकी मंडी वापसी पर भव्य स्वागत समारोह आयोजित किया गया। संयोगवश उस रोज शिवरात्रि थी।
गोरखाओं ने बदले मंडी के समीकरण
19वीं शताब्दी के आरंभ में नेपाल के गोरखा योद्धाओं ने कांगड़ा और मंडी रियासतों पर आक्रमण किया। इस भू-राजनीतिक परिवर्तन ने पहाड़ी रियासतों के सत्ता संतुलन को बदल दिया। गोरखाओं ने राजा ईश्वरी सेन को कांगड़ा की कैद से मुक्त कर पुनः मंडी की गद्दी पर स्थापित किया। यह घटना पहाड़ी राजनीति में सत्ता पुनर्स्थापन का प्रतीक बन गई।
राजा ईश्वरी सेन की वापसी पर मंडी रियासत में खुशियां मनाई गईं और भव्य स्वागत समारोह आयोजित किया गया। राजा ने अपनी रियासत के सभी देवताओं को आमंत्रित कर एक विशाल आयोजन करवाया। वह दिन महाशिवरात्रि का था। तभी से मंडी में हर वर्ष शिवरात्रि मेले की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी जारी है।
सिर्फ धार्मिक नहीं था पहला आयोजन
मंडी में शिवरात्रि मेले का पहला आयोजन केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि राजनीतिक वैधता, सामाजिक एकीकरण, सांस्कृतिक कूटनीति और मंडी के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का एक सशक्त उदाहरण है। इतिहास ने दिखाया कि सांस्कृतिक शक्ति और जनसमर्थन अंततः स्थायी आधार बनते हैं। आज मंडी का शिवरात्रि महोत्सव सांस्कृतिक विरासत, लोकतांत्रिक सहभागिता और ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक है।
ऐतिहासिक दस्तावेज और क्षेत्रीय शोध इस बात को लेकर मुखर हैं कि मंडी शिवरात्रि मेला आज भी उस ऐतिहासिक क्षण का जीवंत दस्तावेज़ है, जब एक पराजित राजा ने उत्सव के माध्यम से अपनी राजनीतिक वापसी को जनआंदोलन में बदल दिया। राजनीति केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक स्मृति निर्माण भी है।
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