नाहन का ‘दिल्ली गेट’ औपनिवेशिक दौर का स्मारक, क्वीन विक्टोरिया के भारत की महारानी घोषित होने पर बना था स्मारक

नाहन का ‘दिल्ली गेट’ औपनिवेशिक दौर का स्मारक, क्वीन विक्टोरिया के भारत की महारानी घोषित होने पर बना था स्मारक
नाहन का ‘दिल्ली गेट’ औपनिवेशिक दौर का स्मारक, क्वीन विक्टोरिया के भारत की महारानी घोषित होने पर बना था स्मारक
विनोद भावुक। नाहन
सिरमौर जिले के मुख्यालय नाहन की गलियों और द्वारों में औपनिवेशिक भारत के छठे वायसराय रॉबर्ट बुल्वर लिटन की एक गहरी और विवादित स्मृति छिपी है। नाहन का‘दिल्ली गेट’ याद दिलाता है कि यह छोटा सा पहाड़ी शहर कभी ब्रिटिश साम्राज्य की सत्ता, प्रतीक और राजनीति से सीधे जुड़ा हुआ था। 1876 से 1880 के बीच रॉबर्ट बुल्वर लिटन भारत के वायसराय थे, उस समय नाहन भी ब्रिटिश प्रशासनिक नक्शे पर एक महत्वपूर्ण बिंदु था।
सिरमौर रियासत की राजधानी होने के कारण नाहन राजनीतिक संवाद, सैन्य संपर्क और रियासती निगरानी का केंद्र बन चुका था। इतिहासकारों के अनुसार, लिटन के काल में नाहन जैसे रियासती नगरों को ब्रिटिश सत्ता के प्रतीकात्मक विस्तार के रूप में विकसित किया गया। दिल्ली गेट, जो आज नाहन की पहचान है, उसी औपनिवेशिक दौर की एक स्मारक छाया है, जिसे स्थानीय परंपरा में लिटन से जोड़ा जाता है।
नाहन तक दिल्ली दरबार की गूंज
1 जनवरी 1877 को दिल्ली में आयोजित भव्य दिल्ली दरबार हुआ, जिसमें क्वीन विक्टोरिया को भारत की महारानी घोषित किया गया। उस समय भारत भीषण अकाल से जूझ रहा था। दिल्ली दरबार की शाही गूंज नाहन जैसे पहाड़ी नगर तक पहुंची। इस बहाने सिरमौर रियासत को यह साफ संदेश दे दिया गया कि ब्रिटिश साम्राज्य अब केवल शासन नहीं, बल्कि शाही सत्ता है।
रॉबर्ट बुल्वर लिटन का नाम भारतीय इतिहास में कई विवादों से जुड़ा है। 1876–78 के अकाल में लाखों लोगों की मौत हुई। 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू हुआ, जिसने भारतीय भाषाओं की प्रेस की स्वतंत्रता को कुचला। इसी काल में दूसरे एंग्लो-अफगान युद्ध ने भारत की सीमाओं को युद्धभूमि में बदल दिया। कलकत्ता से लेकर लंदन तक उनकी आलोचना हुई, फिर भी, नाहन में ब्रिटिश स्मारक के ज़रिए लिटन की सत्ता की छाप बनी रही।
इतिहास की विडंबना
इतिहास बिपिन चंद्र की पुस्तक ‘इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस’ के मुताबिक रॉबर्ट बुल्वर लिटन को भारत में एक कठोर और असंवेदनशील वायसराय के रूप में याद किया जाता है, लेकिन नाहन में आज भी उनका नाम एक ‘गेट’ और स्मृति के रूप में जीवित है। यही इतिहास की विडंबना है, जिसे सत्ता के केंद्र में आलोचना मिली, वही पहाड़ियों में एक स्थायी निशान छोड़ गया।
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Jyoti maurya

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