मलिका-ए-हिंदुस्तान नूरजहां के वालिद, मुग़ल साम्राज्य के सबसे ताकतवर वज़ीर, तेहरान में जन्में, कांगड़ा से कहा दुनिया को अलविदा, आगरा में मकबरा

मलिका-ए-हिंदुस्तान नूरजहां के वालिद, मुग़ल साम्राज्य के सबसे ताकतवर वज़ीर, तेहरान में जन्में, कांगड़ा से कहा दुनिया को अलविदा, आगरा में मकबरा
मलिका-ए-हिंदुस्तान नूरजहां के वालिद, मुग़ल साम्राज्य के सबसे ताकतवर वज़ीर, तेहरान में जन्में, कांगड़ा से कहा दुनिया को अलविदा, आगरा में मकबरा
विनोद भावुक। धर्मशाला
मुग़ल साम्राज्य के सबसे ताकतवर वजीरों में एक और मलिका-ए-हिंदुस्तान नूरजहां के पिता मिर्ज़ा ग़ियास बेग़ उर्फ़ एतमाद-उद-दौला के जीवन की कहानी ईरान के तेहरान के एक प्रतिष्ठित परिवार से शुरू होती है। पिता की मौत के बाद मुफ़लिसी का शिकार यह परिवार रोजी- रोटी की तलाश में हिंदोस्तान की ओर रुख करता है।
मुग़ल बादशाह अकबर के दरबार में मिर्ज़ा ग़ियास बेग़ को नौकरी मिलती है काबुल के दीवान की और फिर वे अपनी काबलियत से मुगल दरबार का अनमोल रत्न बन जाता है। एतमाद-उद-दौला की उपाधि मिलती है और बेटी नूरजहां मलिका-ए-हिंदुस्तान बनती है। जनवरी 1621 में जब मुग़ल शाही लश्कर कश्मीर की ओर बढ़ रहा था तो कांगड़ा में मिर्ज़ा ग़ियास बेग़ खुदा को प्यारे हो जाते हैं।
मुफ़लिसी में जन्मी बेटी बनी मलिका-ए-हिंदुस्तान
1544 में ईरान के तेहरान में जन्मे मिर्ज़ा ग़ियास बेग़ एक प्रतिष्ठित परिवार से थे, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें दर-दर भटकने को मजबूर किया। पिता की मृत्यु के बाद परिवार गरीबी में आ गया और तब उन्होंने हिंदुस्तान की ओर रुख किया। उस दौर में हिंदोस्तान के मुग़ल बादशाह अकबर की दरबार-चमक पूरी दुनिया में मशहूर थी।
लूट, भूख और असुरक्षा से भरी यह यात्रा किसी संघर्षगाथा से कम नहीं थी। रास्ते में कंधार में उनकी बेटी का जन्म हुआ। बेटी का नाम मिहर-उन-निस्सा रखा गया। यह कुदरत की मेहरबानी थी कि जिस बेटी का जन्म अभाव के दौर में हुआ था, आगे चलकर दुनिया मलिका-ए-हिंदुस्तान नूरजहां के नाम से जानने लगी।
कांगड़ा की पहाड़ियों में लिखा अंतिम अध्याय
अकबर के दरबार में प्रवेश के बाद मिर्ज़ा ग़ियास बेग़ की काबिलियत ने उन्हें काबुल का दीवान बनाया। बाद में जहांगीर के शासनकाल में उनकी प्रतिष्ठा और बढ़ी, जब उनकी बेटी नूरजहां जहांगीर की बेग़म बनीं और मिर्ज़ा ग़ियास बेग़ को एतमाद-उद-दौला (राज्य का स्तंभ) की उपाधि मिली।
वे मुग़ल साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली वज़ीरों में गिने जाने लगे।
जनवरी 1621 में जब मुग़ल शाही लश्कर कश्मीर की ओर गर्मियों के प्रवास के लिए बढ़ रहा था, उसी दौरान कांगड़ा के निकट मिर्ज़ा ग़ियास बेग़ का देहांत हो गया। यह तथ्य बहुत कम लोगों को पता है कि मलिका-ए-हिंदुस्तान नूरजहां के पिता की जीवन-यात्रा का अंतिम अध्याय कांगड़ा की पहाड़ियों में लिखा गया।
मुगलसत्ता की विरासत में कांगड़ा का स्थान
मिर्ज़ा ग़ियास बेग़ का पार्थिव शरीर बाद में आगरा ले जाया गया। यमुना किनारे बना एतमाद-उद-दौला का मक़बरा आज भी मुग़ल स्थापत्य का अनमोल रत्न माना जाता है। मिर्ज़ा ग़ियास बेग़ का अंतिम समय कांगड़ा में बिताना कांगड़ा को मुग़लसत्ता की उस विरासत से जोड़ देता है, जिसने मलिका-ए-हिंदुस्तान नूरजहां जैसे अध्याय को जन्म दिया।
तेहरान में जन्में मिर्ज़ा ग़ियास बेग़ की कहानी केवल सत्ता की नहीं, बल्कि संघर्ष से शिखर तक पहुंचने की मिसाल है। उनकी जीवन-यात्रा का अंतिम पड़ाव कांगड़ा बना, यह तथ्य इस हिमालयी क्षेत्र को भारतीय इतिहास के वैश्विक मानचित्र पर और भी विशिष्ट स्थान देता है। कांगड़ा की पहाड़ियों में इतिहास की धड़कनें भी बसती हैं।
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Jyoti maurya

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