पालमपुर था भारत का ‘टी कैपिटल’, दुनिया भर की कंपनियां लगाती थीं बोली
पालमपुर था भारत का ‘टी कैपिटल’, दुनिया भर की कंपनियां लगाती थीं बोली
विनोद भावुक। पालमपुर
हम ‘कांगड़ा चाय’ को उसके फ्लेवर और जीआई टैग से जानते हैं, पर 1905 से पहले तक कांगड़ा चाय का दबदबा इतना बड़ा था कि ब्रिटेन की प्रसिद्ध केलीज़ मर्चेन्ट डायरेक्टरी ने कांगड़ा को दुनिया के प्रमुख चाय व्यापारिक केंद्रों में शामिल किया। चाय कारोबार करने वालों की सूची में सबसे ज़्यादा नाम जिस जगह के सामने थे, वह स्थान था पालमपुर।
यह वह दौर था, जब कांगड़ा चाय सिर्फ एक पेय नहीं थी। यह साम्राज्यवाद, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ब्रिटिश बाजार की नब्ज़ थी। 1903 की केलीज़ मर्चेन्ट डायरेक्टरी में दर्ज नामों को देखें तो साफ पता चलता है कि पालमपुर सिर्फ एक कस्बा नहीं था। यह एशिया का उभरता हुआ चाय व्यापार केंद्र था। यहां का हर पहाड़, हर बगान, हर एस्टेट आर्थिक गतिविधि से भरा हुआ था।
पालमपुर की मशहूर चाय कंपनियां
1. Bluttoo, Palampur, 2. Bandla Tea Co., Palampur, 3. Buoocric Tea Estate, Palampur, 4. Chah Bahar Tea Co., Palampur, 5. Chundpur Tea Estate, Palampur, 6 Karol Tea Estates, Palampur, 7 Dewal Tea Estate, Palumpur, 8 Honorn Tea Estate, Palampur, 9 Kandrali Tea Co., Palampur, 10 Koosmul, Palampur, 11 Monsimbul Tea Estate, Palampur, 12 Mount Somerest, Palampur, 13. Nigel Tea Estate, Palampur, 14 Palsam Tea Estate, Palampur, 15 Poonur Tea & Silk Estate, Palampur, 16. Rulpar, Palampur, 17. Ruchhira Tea Estate, Palampur, 18. Tanda Tea Estate, Palampur, 19. Upper Kangra, Palampur, 20. Western Kangra, Palampur.
क्यों थीं इतनी कंपनियां ? क्यों दुनिया भर में थी मांग?
धौलाधार की पहाड़ियों की मिट्टी चाय के लिए सोने जैसी मानी जाती थी। ठंडी, स्थिर, नमी वाली हवा, जो चाय के स्वाद को गाढ़ा बनाती थी। ब्रिटिश प्लांटर्स ने असम और दार्जिलिंग के बाद तीसरा ‘बड़ा दांव’ कांगड़ा पर लगाया गया था। लंदन, शंघाई, यूरोप और मध्य एशिया तक कांगड़ा की चाय की बोली लगती थी।
केलीज़ डिक्शनरी इस बात का प्रमाण है कि 1903 में कांगड़ा चाय का व्यापार अंग्रेजी साम्राज्य की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा था। ब्रिटिश विशेषज्ञों का मानना था कि कांगड़ा चाय का फ्लेवर दार्जिलिंग जैसा, पर अरोमा उससे भी बेहतर है। इसीलिए दुनिया भर की कंपनियाँ, ब्रिटिश एस्टेट्स, यूरोपीयन ट्रेडर्स, सिल्क–टी कॉम्बिनेशन एस्टेट्स और लोकल-ग्लोबल साझेदारियां यहाँ निवेश करने लगीं।
कांगड़ा के भूकंप में बर्बाद किए बागान
पालमपुर धीरे-धीरे हिमालय का इंटरनेशनल टी हब बन गया। 1905 के कांगड़ा में आए विनाशकारी भूकंप के चलते कांगड़ा का चाय उद्योग लगभग पूरी तरह टूट गया। अधिकतर टी एस्टेट्स बर्बाद हो गईं। धीरे- धीरे चाय उत्पादन से कंपनियां किनारा करने लगीं और साल 1920 के बाद ब्रिटिश कंपनियाँ घाटे में जाने लगीं।
कभी दुनिया की टॉप टी लिस्ट में शामिल कांगड़ा अचानक इस लिस्ट से गायब होने लगा। इतिहास आज भी कहता है कि एक वह भी दौर था, जब कांगड़ा घाटी ने अपनी पहचान चाय उत्पादन और चाय के कारोबार से बनाई थी। यदि 1905 का भूकंप न आता, तो कांगड़ा चाय विश्व बाजार में आज दार्जिलिंग की बराबरी नहीं, उससे कहीं आगे होती।
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